Sit With Sai
श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 06
TL;DRछठा अध्याय शिरडी के वर्ष-दर-वर्ष होते संस्थागत विकास का इतिहास है — एक छोटी मस्जिद वाले ग्राम से लेकर उत्तर-भारत के एक प्रमुख तीर्थ-स्थल बनने तक की यात्रा। हेमाडपंत इस संस्था की संस्थापक घटना के रूप में गोपालराव गुंड का 1897 का "उरुस" (मुसल

अध्याय 6 — रामनवमी का उत्सव और मस्जिद का जीर्णोद्धार

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai6.html

अनुभाग

गुरु-हस्त-स्पर्श पर

हेमाडपंत अध्याय का आरम्भ सद्गुरु के विषय में चिन्तन से करते हैं। वे बाबा का भक्तों को बारम्बार दिया गया आश्वासन उद्धृत करते हैं:

"There will never be any dearth or scarcity, regarding food and clothes, in any devotees' homes. It is My special characteristic, that I always look to, and provide, for the welfare of those devotees, who worship Me whole-heartedly with their minds ever fixed on Me. Lord Krishna has also said the same in the Gita. Therefore, strive not much for food and clothes. If you want anything, beg of the Lord, leave worldly honours, try to get Lord's grace and blessings, and be honored in His Court."

(हिन्दी अर्थ: "किसी भी भक्त के गृह में अन्न-वस्त्र का कभी अभाव अथवा कमी नहीं होगी। मेरा यह विशेष स्वभाव है कि जो भक्त सम्पूर्ण मन से, अपने चित्त को मुझमें स्थिर रखते हुए मेरी पूजा करते हैं, उनके कल्याण की मैं सदैव चिन्ता करता हूँ और उसका प्रबन्ध करता हूँ। भगवान कृष्ण ने गीता में भी यही कहा है। इसलिए अन्न-वस्त्र के लिए अत्यधिक प्रयास मत करो। यदि कुछ चाहिए, तो प्रभु से माँगो — सांसारिक सम्मान त्याग दो, प्रभु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करो, और उनके दरबार में सम्मानित बनो।")

रामनवमी उत्सव का उद्गम (1897)

कोपरगाँव के सर्किल इंस्पेक्टर श्री गोपालराव गुंड बाबा के भक्त थे। उनकी तीन पत्नियाँ थीं किन्तु कोई सन्तान नहीं हो रही थी। बाबा के आशीर्वाद से पुत्र-प्राप्ति के पश्चात उन्होंने 1897 में एक उरुस (मेला) मनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने तात्या पाटिल, दादा कोते पाटिल और माधवराव देशपांडे (शामा) से परामर्श किया। बाबा से अनुमति प्राप्त की। कलेक्टर की स्वीकृति प्रथमतः निरस्त हुई (ग्राम कुलकर्णी ने विरुद्ध रिपोर्ट दी), अन्ततः मिल गयी। बाबा ने तिथि रामनवमी की चुनी — हेमाडपंत के अनुसार जान-बूझकर इस अभिप्राय से कि एक सम्मिलित उत्सव से हिन्दू और मुसलमान दोनों समाज एक हो सकें।

जल और ध्वज

शिरडी में जल की कमी थी। एक कुआँ सूख गया था; दूसरे का जल खारा था। बाबा ने उस दूसरे कुएँ में पुष्प डालकर खारे जल को मीठा कर दिया। तात्या पाटिल ने अतिरिक्त जलापूर्ति के लिए एक दूर के कुएँ पर मोट (चमड़े के थैले) लगवा दिए।

अहमदनगर के दामू अन्ना कासार — जिन्हें भी बाबा ने दीर्घ निःसन्तानता के पश्चात पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया था — गुंड के आग्रह पर शोभा-यात्रा के लिए एक साधारण ध्वज बनवाने के लिए सहमत हो गये। नानासाहेब निमोणकर ने दूसरा कशीदाकारी वाला ध्वज दिया। दोनों ध्वज जुलूस में ले जाये गये और मस्जिद (द्वारकामाई) के दोनों कोनों पर लगाये गये। यह प्रथा आज भी चली आ रही है।

चन्दन-शोभायात्रा

मुस्लिम संतों के सम्मान में `सन्दल` (चन्दन) शोभा-यात्रा का विचार कोरहला के एक मुस्लिम भक्त श्री अमीर शक्कर दलाल ने आरम्भ किया। चन्दन का लेप और छीलन थालियों में रखकर, जलती हुई धूप-अगरबत्तियों के साथ, बैण्ड-बाजों के संग ग्राम में जुलूस के रूप में ले जाते, फिर मस्जिद की `निम्बार` (ताक) और दीवारों पर लगाते। प्रथम तीन वर्ष इसका प्रबन्ध अमीर शक्कर ने स्वयं किया; तदुपरान्त उनकी पत्नी ने किया। ध्वज-शोभायात्रा (हिन्दू) और चन्दन-शोभायात्रा (मुस्लिम) साथ-साथ चलती थीं।

आन्तरिक प्रबन्धन — राधा-कृष्ण माई

मेले का बाह्य प्रबन्ध तात्या कोते पाटिल देखते थे; आन्तरिक प्रबन्ध — आवास, भोजन-निर्माण, सफाई — एक भक्तिनी राधा-कृष्ण माई के हाथ में था। बाबा जिन रातों चावड़ी में सोते थे, उन एकान्तर रातों में वे प्रति वर्ष सम्पूर्ण मस्जिद धोतीं, साफ़ करतीं, चूना लगातीं — धूनी सहित प्रत्येक वस्तु हटाकर, रगड़कर, पुनः उसी स्थान पर रख देतीं। दीन-दुर्बलों को बड़े पैमाने पर भोजन कराने की व्यवस्था उनके निवास-स्थान पर ही होती थी।

रामनवमी-उत्सव में रूपान्तरण (1912)

1912 में भक्त कृष्णराव जागेश्वर भीष्म (पुस्तिका साईं सगुणोपासना के लेखक) अमरावती के दादासाहेब खापर्डे के साथ मेले के लिए आये। दीक्षित वाडे में ठहरे हुए उन्होंने लक्ष्मणराव (काका महाजनी) से सुझाव दिया कि चूँकि उर्स तो रामनवमी के दिन ही पड़ता है, क्यों न वस्तुतः रामनवमी (श्री राम के जन्म) का उत्सव भी यहीं मनाया जाये। हरिदास (कीर्तनकार) न मिलने की कठिनाई का समाधान भीष्म ने स्वयं प्रस्तुत कर दिया — उनका `राम-आख्यान` (राम-जन्म पर रचना) तैयार था; वे स्वयं कीर्तन करेंगे और महाजनी हारमोनियम बजायेंगे। राधा-कृष्ण माई ने प्रसाद के लिए `सूँठावडा` (सूँठ और शक्कर) तैयार किया।

बाबा की अनुमति प्राप्त की गयी। मस्जिद सजायी गयी, बाबा के आसन के सम्मुख राधा-कृष्ण माई द्वारा भेजा गया झूला रखा गया, और कीर्तन आरम्भ हुआ। कीर्तन की समाप्ति पर "श्री राम जय राम" के घोष के साथ लाल गुलाल उड़ाया गया, और कुछ गुलाल बाबा की आँखों में चला गया। वे क्रुद्ध हो उठे और ज़ोर से डाँटने-फटकारने लगे। लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागे। अन्तरंग भक्तों ने इसे आशीर्वाद का संकेत माना — बाबा अहंकार-रूपी दैत्यों पर राम का क्रोध प्रकट कर रहे हैं। जब महाजनी झूला उतारने आये, बाबा ने उन्हें रोक दिया: "उत्सव अभी समाप्त नहीं हुआ है।" दूसरे दिन का कीर्तन और गोपाल-काला उत्सव (पोहे-दही से भरी मटकी का फोड़ना) सम्पन्न हुआ, तभी बाबा ने झूला उतारने की अनुमति दी।

1913 से आगे उत्सव-तत्त्व विस्तृत होते गये: राधा-कृष्ण माई ने चैत्र की प्रतिपदा से एक `नाम-सप्ताह` (सात-दिवसीय अखण्ड हरि-नाम) आरम्भ किया। 1914 से बाबा ने कीर्तन का स्थायी दायित्व दास गणु महाराज को सौंप दिया।

बाद के वर्षों में यह उत्सव प्रारम्भिक 5,000-7,000 की उपस्थिति से बढ़कर 75,000 तक भक्तों को आकृष्ट करता था। हिन्दू और मुसलमान बिना किसी विवाद के दोनों जुलूसों में परस्पर सहयोग करते थे।

मस्जिद का जीर्णोद्धार

गोपाल गुंड ने जीर्णोद्धार के लिए पत्थर भी एकत्र किए थे, किन्तु बाबा ने अन्ततः यह कार्य नानासाहेब चांदोरकर को सौंपा, और फ़र्श (फरसा) काकासाहेब दीक्षित को। फ़र्श एक रात में सम्पन्न हुआ; बाबा ने तब तक वे जिस टाट पर बैठते थे, उसके स्थान पर एक छोटी `गद्दी` स्वीकार कर ली।

1911 में सभा-मण्डप (आँगन) का निर्माण पूर्ण हुआ। काकासाहेब दीक्षित ने मस्जिद के सामने के खुले स्थान को ढकने के लिए लोहे के स्तम्भ और कड़ियाँ मँगवायीं। भक्तों ने रात्रि में स्तम्भ गाड़े; प्रातः बाबा ने उन्हें उखाड़कर बाहर फेंक दिया।

एक क्षण बाबा अत्यन्त उत्तेजित हो गये: एक हाथ से उन्होंने एक स्तम्भ पकड़कर हिलाना-उखाड़ना शुरू कर दिया; दूसरे हाथ से उन्होंने तात्या पाटिल को गले से पकड़ लिया। तात्या का फेंटा खींचकर माचिस से जला दिया और जलते हुए उसे एक गड्ढे में फेंक दिया। उनकी आँखें जलते अंगारे की भाँति दीप्त थीं। उन्होंने अपनी जेब से एक रुपया निकाला और जैसे आहुति देते हों — भूमि पर फेंक दिया। भगोजी शिन्दे और माधवराव ने हस्तक्षेप करना चाहा — दोनों पीछे हटा दिये गये (माधवराव पर ईंट के टुकड़े फेंके गये)। तदुपरान्त सहसा शान्त होकर बाबा ने एक दुकानदार को बुलवाया, एक कशीदाकारी वाला फेंटा मँगवाया, और जैसे कोई विशेष सम्मान प्रदान कर रहे हों — तात्या के सिर पर बाँध दिया।

हेमाडपंत टिप्पणी करते हैं: बाबा कभी अत्यन्त शान्त, और कभी (बिना कारण अथवा कारण-सहित) सहसा क्रुद्ध हो उठते — और उनके क्रोध-प्रसंगों का अर्थ सदा स्पष्ट नहीं होता था।

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. "There will never be any dearth or scarcity, regarding food and clothes, in any devotees' homes. It is My special characteristic, that I always look to, and provide, for the welfare of those devotees, who worship Me whole-heartedly with their minds ever fixed on Me."

(हिन्दी अर्थ: "किसी भी भक्त के गृह में अन्न-वस्त्र का कभी अभाव अथवा कमी नहीं होगी। यह मेरा विशेष स्वभाव है कि जो भक्त सम्पूर्ण मन से, अपने चित्त को मुझमें स्थिर रखते हुए मेरी पूजा करते हैं, उनके कल्याण की मैं सदैव चिन्ता करता हूँ और उसका प्रबन्ध करता हूँ।")

  1. "If you want anything, beg of the Lord, leave worldly honours, try to get Lord's grace and blessings, and be honored in His Court."

(हिन्दी अर्थ: "यदि कुछ चाहिए, तो प्रभु से माँगो — सांसारिक सम्मान त्याग दो, प्रभु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करो, और उनके दरबार में सम्मानित बनो।")

  1. (महाजनी को उत्सव के समय) "The festival is not yet finished."

(हिन्दी अर्थ: "उत्सव अभी समाप्त नहीं हुआ है।")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·