नानासाहेब चांदोरकर
नन्दुरबार, पंढरपुर, जामनेर के मामलतदार। डेक्कन-कॉलेज से एम.ए. इन वेदान्त। बाबा का यश अनेक उच्च-शिक्षित मित्रों — काकासाहेब दीक्षित, तात्यासाहेब नूलकर, हेमाडपंत — के बीच पहुँचाने वाले मुख्य माध्यम।
मूल तथ्य
| शिक्षा | एम.ए. (वेदान्त) — डेक्कन कॉलेज, पुणे |
|---|---|
| व्यवसाय | मामलतदार — नन्दुरबार, पंढरपुर, जामनेर |
| पुत्री | मैनाताई — जामनेर के चमत्कार की मुख्य भक्त |
| पुत्र | बापूराव चांदोरकर — 1936 के नरसिंह स्वामी बयान के बयानकर्ता |
जीवन-प्रसंग
बाबा का दूरस्थ ज्ञान
जब नानासाहेब का नन्दुरबार से पंढरपुर स्थानान्तरण हुआ और वे बिना सूचना के सीधे शिरडी होते हुए जाने को निकले, बाबा ने मस्जिद में म्हाळसापति, अप्पा शिन्दे और काशिराम से कहा: 'हम चारों भजन करें — पंढरी के द्वार खुले हैं।' थोड़ी ही देर में नानासाहेब परिवार सहित आ गये (अध्याय 7)।
दत्त-मन्दिर के अनादर पर डाँट
एक बार नानासाहेब ने समय बचाने के लिए कोपरगाँव के गोदावरी-तट के दत्त-मन्दिर को छोड़ दिया था। बाबा क्रुद्ध हुए: 'तुम मेरे साथ इतने काल से हो — और ऐसा आचरण करते हो?' स्नान के समय गोदावरी में बड़ा काँटा पैर में चुभ गया था — बाबा बोले: 'वही अल्प दण्ड था' (अध्याय 38)।
जामनेर का चमत्कार (1904-05)
मैनाताई के प्रसव-कष्ट में बाबा ने रामगिरबुवा को शिरडी से 100 मील दूर जामनेर भेजा — मात्र 2 रुपये जेब में। 'ईश्वर देंगे।' जलगाँव में रात्रि 2:45 बजे एक अज्ञात वर्दीधारी चपरासी ने ताँगा-सेवा दी, और शामा के लिखे आरती-पाठ के साथ उदी पहुँचा दी। मैनाताई का सुरक्षित प्रसव हुआ; चपरासी और ताँगा शीघ्र ही अदृश्य हो गये। नानासाहेब ने कोई चपरासी नहीं भेजा था (अध्याय 33)।
बुबॉनिक प्लेग — सड़क की मिट्टी
बान्द्रा के एक भक्त की दूरस्थ पुत्री प्लेग-ग्रस्त थी। नानासाहेब को ठाणे-स्टेशन पर संदेश मिला; उदी नहीं थी; उन्होंने सड़क से मिट्टी उठायी, बाबा का ध्यान किया, अपनी पत्नी के मस्तक पर लगायी — और उसी क्षण से पुत्री में सुधार आरम्भ हो गया (अध्याय 33)।
गीता 4.34 की व्याख्या
वेदान्त-गर्वित नानासाहेब बाबा के पैर दबाते हुए गीता 4.34 बुदबुदा रहे थे। बाबा ने शब्द-दर-शब्द व्याख्या माँगी और तीन परीक्षाओं में उनके गर्व को चकनाचूर कर दिया — प्रणिपात, परिप्रश्न, सेवा के सच्चे अर्थ बताये (अध्याय 39-40)।
परदा-नशीन महिला के सौन्दर्य पर
बीजापुर की महिला के दुर्लभ सौन्दर्य से नानासाहेब अभिभूत हो उठे। बाबा बोले: 'इन्द्रियों को अपना कर्म करने दो… जब हृदय शुद्ध है, कोई कठिनाई नहीं' (अध्याय 49)। शामा को नानासाहेब ने मार्ग में इस शिक्षा की व्याख्या की।