तात्या कोते पाटिल
बायजाबाई के पुत्र। बाबा के 14-वर्ष शय्या-साथी। बाबा उन्हें 'मामा' कहते थे। चावड़ी शोभा-यात्रा में सट्का, चिलम, और सोने वस्त्र बाबा को पहनाने का दायित्व। 1918 की विजयादशमी पर मरते-मरते बच गये — बाबा ने उनकी मृत्यु अपने ऊपर ले ली।
मूल तथ्य
| माता | बायजाबाई — बाबा के प्रारम्भिक काल की भोजन-सेविका (अध्याय 8) |
|---|---|
| बाबा का सम्बोधन | मामा |
| रात्रि-त्रिकूट | बाबा (पूर्व), तात्या (पश्चिम), म्हाळसापति (उत्तर) — 14 वर्ष |
| शय्या-व्यवस्था की समाप्ति | तात्या के पिता की मृत्यु के पश्चात; तब वे अपने घर लौटे |
जीवन-प्रसंग
बायजाबाई का जंगल-भोजन
तात्या की माता बायजाबाई बाबा के प्रारम्भिक शिरडी-काल में प्रति-दिन सिर पर रोटी-सब्जी की टोकरी लिए कोस-कोस पार करके जंगल में बाबा को खोजकर बलपूर्वक खिलातीं। बाबा ने उनकी सेवा कभी नहीं भुलायी (अध्याय 8)।
चावड़ी शोभा-यात्रा का स्तम्भ
1909 से 1918 तक हर एकान्तर रात्रि तात्या ही बाबा के तैयार होने पर हाथ बढ़ाते, स्वर्ण-कशीदाकारी का शेला ओढ़ाते, और मस्जिद से चावड़ी तक बायाँ हाथ पकड़कर ले जाते (अध्याय 37)।
बाबा के यात्रा-आदेश की उपेक्षा
एक बार जल्दबाजी में तात्या ने बाबा के 'जल्दी न करो, बाज़ार छोड़ दो' निर्देश की अवहेलना की। सावुल-कुएँ के आगे उनके 300 रुपये के अश्व ने कमर में मोच खाकर गिर पड़ा (अध्याय 9)।
बकरी-परीक्षा से इनकार
जब बाबा ने तात्या से एक बकरी के सिर काटने को कहा (अध्याय 23), तात्या ने कोई इनकार नहीं दिया — परन्तु अन्ततः वह कार्य काकासाहेब दीक्षित पर आ गया और अन्तिम क्षण पर बाबा ने रोक दिया।
1918 की विजयादशमी पर मरते-मरते बचे
बाबा ने दो वर्ष पूर्व रामचन्द्र दादा पाटिल को बताया था: 'तात्या शक संवत् 1840 की विजयादशमी पर देह त्यागेंगे।' दशहरा 1918 पर तात्या वस्तुतः शय्या-शायी थे — पर 'तात्या बच गये, और बाबा उनके स्थान पर देह त्याग गये' (अध्याय 42)। ग्रामवासियों ने कहा: 'बाबा ने तात्या के लिए अपना जीवन दे दिया।'