दास गणु महाराज
हरिदास (कीर्तनकार) जिन्होंने 1908-12 के बीच बम्बई-प्रेजिडेन्सी में बाबा की महिमा फैलायी। बाबा ने उनके चरणों के अँगूठों से गंगा-यमुना की धाराएँ बहाकर 'हमारा प्रयाग यहीं है' सिद्ध किया।
मूल तथ्य
| पूर्व-व्यवसाय | पुलिस-दल; तत्पश्चात कीर्तनकार |
|---|---|
| रचना | *भक्त लीलामृत* अध्याय 31-33; *संत कथामृत* अध्याय 57 — बाबा पर पूर्व-1929 जीवनी |
| भूमिका | 1914 से रामनवमी पर शिरडी का स्थायी कीर्तनकार |
| बाबा-निर्देश | बाबा ने उनसे नाम-सप्ताह (7-दिन अखण्ड नाम-जप) कराया (अध्याय 4) |
जीवन-प्रसंग
'हमारा प्रयाग यहीं है'
दास गणु प्रयाग-स्नान की अनुमति माँगने आये। बाबा बोले: 'इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं — हमारा प्रयाग यहीं है।' दास गणु ने जब बाबा के चरणों पर सिर रखा, सच्चरित्र दर्ज करता है कि बाबा के दोनों पैरों के अँगूठों से गंगा-यमुना की धाराएँ बह निकलीं (अध्याय 4)।
नाम-सप्ताह
बाबा ने दास गणु को सात-दिन का अखण्ड नाम-जप करने को कहा — इस आश्वासन पर कि सातवें दिन विट्ठल साक्षात् दर्शन देंगे। पूर्ति के पश्चात काकासाहेब दीक्षित को विट्ठल-दर्शन हुआ, और एक फेरीवाला उसी दिन ठीक उसी रूप का चित्र लेकर आया (अध्याय 4)।
बम्बई-प्रेजिडेन्सी के कीर्तन
1908-12 के बीच दास गणु के बम्बई-प्रेजिडेन्सी कीर्तनों ने बाबा का यश ठाणे, बम्बई, पुणे, गोवा और बेरार तक फैलाया। हरिश्चन्द्र पिटले, अप्पासाहेब कुलकर्णी, चोलकर सहित अनेक भक्त इन्हीं कीर्तनों से प्रेरित होकर शिरडी आये।
ईशावास्य-उपनिषद् की कठिनाई
दास गणु मराठी 'ओवी' में ईशावास्य-उपनिषद् का भाष्य कर रहे थे; अटक गये। बाबा ने कहा: 'काकासाहेब दीक्षित की दासी विले-पारले में तुम्हारी शंका हल कर देगी।' एक निर्धन बालिका के नयी साड़ी पर आनन्द और बिना उसके भी समान संतोष ने उन्हें शिक्षा का व्यावहारिक प्रदर्शन दिया (अध्याय 20)।
नारदीय शैली
एक बार दास गणु पूरा हरिदास-वेश पहनकर बाबा को प्रणाम करने आये। बाबा बोले: 'अरे दूल्हे राजा! इन साज-सामानों का क्या प्रयोजन? सब उतार दो।' उस दिन से दास गणु कमर के ऊपर निर्वस्त्र, हाथ में चिपलियाँ, और गले में माला पहनकर कीर्तन करते — सरल नारदीय शैली (अध्याय 15)।
पंढरपुर में अन्तिम स्वप्न-दर्शन
बाबा की महासमाधि (15 अक्टूबर 1918) के अगले प्रातः बाबा दास गणु को पंढरपुर में स्वप्न-दर्शन में आये: 'मस्जिद ढह गयी… कृपया वहाँ शीघ्र जाओ और मुझे भकल पुष्पों से ढक दो' (अध्याय 42)।