काकासाहेब दीक्षित (हरि सीताराम, 1864-1926)
खण्डवा (मध्य प्रान्त) के वड़नगर नागर ब्राह्मण। बम्बई के सॉलिसिटर, मेसर्स लिटिल एंड कम्पनी के साझेदार। बम्बई विधान-मण्डल के सदस्य। 10 दिसम्बर 1910 को दीक्षित वाडे की नींव रखी। 5 जुलाई 1926 को रेल में हेमाडपंत के साथ बात करते-करते अन्तिम श्वास।
मूल तथ्य
| जन्म | 1864 — खण्डवा (मध्य प्रान्त) |
|---|---|
| शिक्षा | विल्सन कॉलेज और एल्फिनस्टन कॉलेज, बम्बई; एलएल.बी. (1883); सॉलिसिटर-परीक्षा |
| व्यवसाय | बम्बई सॉलिसिटर; मेसर्स लिटिल एंड कम्पनी के साझेदार |
| शिरडी प्रथम-आगमन | 1909 — लंदन में रेल पर चढ़ते समय हुई पैर-चोट के पश्चात |
| दीक्षित वाडे की नींव | 10 दिसम्बर 1910 — रामनवमी 1911 पर निवास-योग्य |
| देहान्त | 5 जुलाई 1926 — रेल में, हेमाडपंत के कन्धे पर |
जीवन-प्रसंग
'मेरे पैर की नहीं — मेरे मन की लंगड़ाहट ठीक करें'
1909 में लोनावला में नानासाहेब चांदोरकर ने उन्हें बाबा के विषय में बताया। दीक्षित ने कहा कि उनके लँगड़े पैर से कहीं अधिक उन्हें 'अपने लँगड़े-चंचल मन की चिकित्सा' चाहिए। बाबा-वचन 'सात समुद्र पार से भी, मैं अपने भक्त को डोरा-बँधी चिड़िया की भाँति खींच लाता हूँ' — उन्हें खींच लाया (अध्याय 50)।
दीक्षित वाडा
बाबा की अनुमति से 10 दिसम्बर 1909 की रात्रि नींव रखी गयी — उसी रात्रि चावड़ी की आरती-प्रथा का आरम्भ हुआ। रामनवमी 1911 पर निवास-योग्य। यह वाडा सच्चरित्र-काल के अनेक प्रसंगों का केन्द्रीय आश्रय बना।
बकरी-परीक्षा
बाबा ने एक बकरी काटने को तीन भक्तों को कहा — बड़े बाबा ने इनकार किया, शामा हिचकिचाये, और अन्ततः शुद्ध ब्राह्मण काकासाहेब ने चाक़ू उठाया। अन्तिम क्षण पर बाबा बोले: 'रुको, क्रूर — ब्राह्मण होकर बकरी मारते हो?' काकासाहेब का उत्तर: 'गुरु के आदेश का तत्काल पालन ही हमारा कर्तव्य और धर्म है' (अध्याय 23)।
'चिट्ठियाँ डालने' का अभ्यास
किसी भी संदिग्ध विषय पर काकासाहेब बाबा के चित्र के चरणों पर 'स्वीकार करूँ / अस्वीकार करूँ' चिट्ठियाँ रखकर एक शिशु से चुनवाते। आनन्दराव पाखाडे की रेशम-धोती-धैर्य-परीक्षा इसी प्रथा से सुलझायी गयी (अध्याय 45)।
'मैं उन्हें वायु-यान में ले जाऊँगा'
बाबा ने काकासाहेब को आश्वासन दिया था: 'अन्ततः मैं उन्हें वायु-यान (विमान) में ले जाऊँगा।' 5 जुलाई 1926 को काकासाहेब हेमाडपंत के साथ एक रेल में थे, बाबा की बात करते-करते 'पूर्ण-तल्लीन' सहसा हेमाडपंत के कन्धे पर गर्दन फेंककर अन्तिम श्वास ले गये — बिना तनिक पीड़ा (अध्याय 50)।