Sit With Sai
श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 04
TL;DRचौथा अध्याय सच्चरित्र की जीवनी-संबन्धी आधार-शिला है — और बाबा के मूल-उद्भव पर जान-बूझकर एक कुहासे की चादर डाले हुए। हेमाडपंत बाबा के प्रथम दर्शन — एक सोलह वर्ष के बालक के रूप में नीम वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए — की तुलना भक्ति-परम्परा के

अध्याय 4 — साईं बाबा का शिरडी में प्रथम आगमन

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai4.html

अनुभाग

संतों का प्रयोजन

हेमाडपंत भगवद्गीता के अध्याय 4, श्लोक 7-8 का उद्धरण देते हैं — "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति… तदात्मानं सृजाम्यहम्" — और भक्ति-परम्परा के संतों का नामोल्लेख करते हैं (निवृत्ति, ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, नामदेव, गोरा, गोनाई, एकनाथ, तुकाराम, नरहरि, नर्सी भगत, सजन कसाई, सावता, रामदास) — और तदुपरान्त साईं बाबा को इसी संत-परम्परा में स्थापित करते हैं।

शिरडी — एक पुण्य तीर्थ

शिरडी अहमदनगर जिले की कोपरगाँव तहसील में स्थित है। कोपरगाँव में गोदावरी पार करने के पश्चात तीन कोस (नौ मील) पर निमगाँव आता है, जहाँ से शिरडी दिखाई देती है।

साईं बाबा का व्यक्तित्व — हेमाडपंत का वर्णन

"He was the home of Vaishnava devotees… The name of Allah was always on His lips. While the world awoke, He slept; and while the world slept, He was vigilant… Though a Siddha, He acted like a Sadhaka. He was meek, humble and egoless, and pleased all."

(हिन्दी अर्थ: "वे वैष्णव भक्तों के आश्रय थे… अल्लाह का नाम सदैव उनके अधरों पर रहता था। जब संसार जागता था, वे सोते थे; जब संसार सोता था, वे जागृत रहते थे… सिद्ध होते हुए भी वे साधक की भाँति आचरण करते थे। वे विनम्र, नम्र और निरहंकार थे, और सब को प्रसन्न रखते थे।")

गौलीबुवा की साक्षी

एक वृद्ध भक्त — गौलीबुवा (लगभग 95 वर्ष) — पंढरपुर के वारकरी थे, प्रति वर्ष आठ मास पंढरपुर में और चार मास गंगा-तट पर बिताते थे। वे प्रति वर्ष शिरडी आते, बाबा को एकटक निहारते, और कहते: "ये साक्षात् पंढरीनाथ विट्ठल का अवतार हैं — दीन-असहायों के दयालु प्रभु।"

दास गणु का नाम-सप्ताह और विट्ठल का दर्शन

बाबा ने एक बार दास गणु महाराज से नाम-सप्ताह (सात दिन का अखण्ड नाम-जप) करने को कहा। दास गणु बोले कि वे ऐसा तभी करेंगे यदि उन्हें आश्वासन मिले कि सातवें दिन विट्ठल अवश्य दर्शन देंगे। बाबा ने दास गणु की छाती पर हाथ रखकर आश्वासन दिया कि विट्ठल आयेंगे — परन्तु इस शर्त पर कि "भक्त सच्चा और श्रद्धावान हो।" बाद में उन्होंने कहा:

"The Dankapuri (Takore) of Takurnath, the Pandhari of Vithal, the Dwarka of Ranchhod (Krishna) is here (Shirdi). One need not go far out to see Dwarka. Will Vithal come here from some outside place? He is here."

(हिन्दी अर्थ: "ठाकुरनाथ की डंकापुरी (टाकोर), विट्ठल की पंढरी, रणछोड़ (कृष्ण) की द्वारका — सब यहीं (शिरडी में) है। द्वारका देखने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं। क्या विट्ठल कहीं बाहर से यहाँ आयेंगे? वे तो यहीं हैं।")

सप्ताह की समाप्ति के पश्चात काकासाहेब दीक्षित को प्रातः के ध्यान के बाद विट्ठल का दर्शन हुआ। दोपहर को मस्जिद पहुँचने पर बाबा ने बिना भूमिका के पूछा: "क्या विट्ठल पाटिल आये? क्या तुमने उन्हें देखा? वे बड़े चंचल हैं — दृढ़ता से पकड़े रहना, अन्यथा निकल भागेंगे।" उसी दिन एक फेरीवाला बाहर से आया, 25-30 विठोबा के चित्र लिए हुए; एक चित्र बिल्कुल वैसा ही था जैसा काकासाहेब ने ध्यान में देखा था। काकासाहेब ने वह चित्र लेकर अपनी देव-स्थानिका में स्थापित कर दिया।

भगवन्तराव क्षीरसागर की कथा

भगवन्तराव के पिता विठोबा के भक्त थे, प्रति वर्ष पंढरपुर की वारी करते थे, और घर में मूर्ति रखकर पूजा करते थे। पिता की मृत्यु के पश्चात पुत्र ने वारी, पूजा और श्राद्ध — तीनों बन्द कर दिए। जब भगवन्तराव शिरडी आये, बाबा बोले:

"His father was my friend, so I dragged him here. He never offered naivaidya and so he starved Vithal and Me. So I brought him here. I shall remonstrate him now and set him to worship."

(हिन्दी अर्थ: "उसका पिता मेरा मित्र था, इसी कारण मैंने उसे यहाँ खींच लिया। उसने कभी नैवेद्य नहीं चढ़ाया, अतः उसने विट्ठल और मुझे — दोनों को भूखा रखा। इसी कारण मैं उसे यहाँ ले आया हूँ। अब मैं उसे झिड़कूँगा और पूजा में लगाऊँगा।")

दास गणु का प्रयाग-स्नान

दास गणु प्रयाग (गंगा-यमुना संगम) में स्नान करना चाहते थे और बाबा से अनुमति लेने आये। बाबा का उत्तर:

"It is not necessary to go so long. Our Prayag is here, believe me."

(हिन्दी अर्थ: "इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारा प्रयाग यहीं है — मेरा विश्वास करो।")

जब दास गणु ने बाबा के चरणों पर सिर रखा, सच्चरित्र दर्ज करता है कि बाबा के दोनों पैरों के अँगूठों से गंगा-यमुना की धाराएँ बह निकलीं।

साईं बाबा की अनैसर्गिक उत्पत्ति और प्रथम आगमन

हेमाडपंत स्पष्ट लिखते हैं कि बाबा के माता-पिता, जन्म-तिथि अथवा जन्म-स्थान के विषय में कुछ भी निश्चित ज्ञात नहीं है। वे इसकी तुलना नामदेव (जो भीमरथी नदी के तट पर गोनाई द्वारा प्राप्त किए गये थे) और कबीर (जो भागीरथी के तट पर तमाल द्वारा प्राप्त किए गये थे) से करते हैं। बाबा "पहली बार सोलह वर्ष के एक तरुण रूप में शिरडी में नीम वृक्ष के नीचे प्रकट हुए।"

नाना चोपदार की माता ने उनका वर्णन इस प्रकार किया: एक गोरा, चतुर, सुन्दर बालक नीम वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठा हुआ, धूप-शीत से अचंचल कठोर तपस्या में मग्न था — दिन में किसी से सम्भाषण नहीं, रात्रि में किसी से भय नहीं। एक दिन "खण्डोबा देव ने किसी भक्त के शरीर में प्रवेश किया" और उनसे पूछा गया कि यह बालक कौन है। खण्डोबा ने लोगों को आदेश दिया कि कुदाली लाओ और एक निश्चित स्थान पर खोदो। एक चपटी शिला के नीचे ईंटें निकलीं; शिला हटाने पर एक गलियारा प्रकट हुआ जो एक तहखाने तक जाता था, जहाँ "गोमुख-आकार की रचनाएँ, काष्ठ-पट्ट, और मालाएँ" दिखायी दीं। खण्डोबा बोले: "इस बालक ने यहाँ बारह वर्ष तपस्या की है।"

जब बालक से पूछा गया, उसने केवल इतना कहा कि यह उसके गुरु का स्थान है, उसका पुण्य वतन है, और उन्होंने प्रार्थना की कि इसकी रक्षा की जाये। गलियारा पुनः बन्द कर दिया गया। नीम वृक्ष को बाबा ने स्वयं पवित्र माना। म्हाळसापति और अन्य प्रारम्भिक भक्त इस स्थान को बाबा के गुरु की समाधि-स्थली मानते थे।

तीन वाडे

  1. साठेवाडा — नीम वृक्ष वाला स्थान (और आसपास की भूमि) हरि विनायक साठे ने क्रय किया, और एक बड़ा वाडा निर्मित किया। वृक्ष के चारों ओर एक चबूतरा (पार) बनाया गया, सीढ़ियों और दक्षिणाभिमुख ताक के साथ। भक्त गुरुवार और शुक्रवार की सायंकाल वहाँ धूप जलाते हैं।
  1. दीक्षित वाडा — काकासाहेब दीक्षित, बम्बई के एक सॉलिसिटर, इंग्लैण्ड में एक दुर्घटना में अपना पैर तुड़वा बैठे थे। चोट लाइलाज थी। नानासाहेब चांदोरकर ने बाबा के दर्शन करने का सुझाव दिया। 1909 में वे शिरडी आये और बाबा से प्रार्थना की — "मेरे पैर की लंगड़ाहट नहीं, अपितु मेरे मन की लंगड़ाहट दूर कर दें।" वाडे की नींव 10 दिसम्बर 1910 को रखी गयी — उसी दिन दादासाहेब खापर्डे को बाबा ने घर लौटने की अनुमति दी थी, और उसी रात्रि चावड़ी की आरती आरम्भ हुई थी। वाडा रामनवमी 1911 के दिन निवास-योग्य हुआ।
  1. बूटी वाडा — नागपुर के धनी श्री बूटी द्वारा निर्मित। आज बाबा का शरीर इसी वाडे में विश्राम कर रहा है — यही समाधि मन्दिर है। इसकी भूमि पहले एक उद्यान थी जिसकी सिंचाई और देखभाल स्वयं बाबा किया करते थे।

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. "Did Vithal Patil come? Did you see Him? He is a very truant fellow, catch Him firmly, otherwise He will escape."

(हिन्दी अर्थ: "क्या विट्ठल पाटिल आये? क्या तुमने उन्हें देखा? वे बड़े चंचल हैं — दृढ़ता से पकड़े रहो, अन्यथा निकल भागेंगे।")

  1. "His father was my friend, so I dragged him here. He never offered naivaidya and so he starved Vithal and Me."

(हिन्दी अर्थ: "उसका पिता मेरा मित्र था, अतः मैंने उसे यहाँ खींच लिया। उसने कभी नैवेद्य नहीं चढ़ाया, इसलिए उसने विट्ठल और मुझे — दोनों को भूखा रखा।")

  1. "It is not necessary to go so long. Our Prayag is here, believe me."

(हिन्दी अर्थ: "इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारा प्रयाग यहीं है — मेरा विश्वास करो।")

  1. "The Dankapuri (Takore) of Takurnath, the Pandhari of Vithal, the Dwarka of Ranchhod (Krishna) is here (Shirdi)."

(हिन्दी अर्थ: "ठाकुरनाथ की डंकापुरी (टाकोर), विट्ठल की पंढरी, रणछोड़ (कृष्ण) की द्वारका — सब यहीं (शिरडी में) है।")

  1. (नीम-वृक्ष के तहखाने के विषय में ग्रामवासियों से — स्वयं बालक के माध्यम से) "This is My Guru's place, His holy Watan; guard it well."

(हिन्दी अर्थ: "यह मेरे गुरु का स्थान है, उनका पुण्य वतन है; इसकी रक्षा भली-भाँति करना।")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·