अध्याय 5 — चाँद पाटिल की बारात के साथ पुनरागमन; "या साईं"; जल वाले दीप; छद्म-गुरु जौहर अली
स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html
मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai5.html
अनुभाग
चाँद पाटिल की बारात के साथ पुनरागमन
औरंगाबाद जिले के ढूप ग्राम का एक सम्पन्न मुसलमान, चाँद पाटिल, औरंगाबाद यात्रा के समय अपनी घोड़ी खो बैठा। दो मास खोज के पश्चात वह कन्धे पर ज़ीन उठाये घर लौट रहा था। औरंगाबाद से साढ़े चार कोस पर उसने आम के वृक्ष के नीचे एक तरुण फ़कीर देखा — कफनी और टोपी पहने, बगल में सट्का दबाये, चिलम जलाने की तैयारी में। फ़कीर ने उसे पास बुलाया, ज़ीन के विषय में पूछा, और निकट के एक नाले में खोजने का संकेत दिया। चाँद पाटिल को घोड़ी वहीं मिल गयी।
चिलम के लिए अग्नि और छाँपी (छन्ने के कपड़े) के लिए जल चाहिए था। फ़कीर ने अपना सरिया भूमि में घुसाया — एक जलता हुआ अंगारा बाहर आया; सट्का भूमि पर मारा — जल फूट निकला। चाँद पाटिल विस्मित होकर उन्हें "औलिया" कह उठा। उसने फ़कीर को अपने घर निमन्त्रित किया; फ़कीर कुछ दिन वहाँ रहे, फिर पाटिल की पत्नी के भांजे के विवाह की बारात के साथ शिरडी आये। बारात ढूप लौट गयी; फ़कीर शिरडी में ही शेष जीवन ठहरे रहे।
"या साईं" — नाम कैसे पड़ा
बारात भगत म्हाळसापति के खेत में, खण्डोबा-मन्दिर के समीप, एक वट-वृक्ष की छाया में उतरी। ज्यों ही तरुण फ़कीर गाड़ी से नीचे उतरे, म्हाळसापति ने उनका अभिवादन किया: "या साईं" — "आइए, साईं, स्वागत है।" अन्य लोगों ने भी इसी सम्बोधन से बात की और यही नाम रह गया।
अन्य संतों से सम्पर्क
इस प्रारम्भिक काल में बाबा के साथी संत के रूप में देवीदास (जो वर्षों पहले से शिरडी में थे), जानकीदास, और पुणतांब्याचे गंगागिर का नामोल्लेख होता है। गंगागिर ने पहली बार बाबा को बाग़ के लिए जल ले जाते देखकर खुले शब्दों में कहा: "धन्य है शिरडी, जिसे यह बहुमूल्य रत्न मिला है।" येवला मठ के संत आनन्दनाथ, जो अकलकोट महाराज के शिष्य थे, बोले: "वस्तुतः यह एक अमूल्य हीरा है। दिखने में साधारण मनुष्य के समान है, परन्तु यह गर (साधारण पत्थर) नहीं — हीरा है।"
बाबा का वेश और दिनचर्या
प्रारम्भिक वर्षों में बाबा ने केश बढ़ाये, पहलवान की भाँति पहनावा रखा, और रहाता (3 मील) से गेंदा, जाई और जुई के पौधे लाकर रोपे। वामन तात्या प्रति दिन दो मिट्टी के घड़े देते थे; बाबा कुएँ से जल निकालकर बाग़ की सिंचाई करते, और घड़े नीम वृक्ष के नीचे रख देते जहाँ वे प्रत्येक सायं टूट जाते थे (कच्ची, बिना पकी मिट्टी के थे)। यह क्रम तीन वर्ष चला, और एक पुष्प-वाटिका विकसित हुई। उसी स्थान पर आज समाधि मन्दिर खड़ा है।
नीम वृक्ष के नीचे पादुका-स्थापना की कथा
अकलकोट महाराज के एक भक्त, भाई कृष्णाजी अलीबागकर, महाराज की पादुकाओं के दर्शनार्थ अकलकोट जाने की तैयारी कर रहे थे। प्रस्थान से पूर्व उन्हें एक दर्शन हुआ: अकलकोट महाराज प्रकट होकर बोले — "अब शिरडी मेरा विश्राम-स्थल है, वहीं जाओ और पूजा अर्पित करो।" भाई शिरडी आये और छह मास ठहरे। पादुकाएँ शक संवत् 1834 (1912 ईस्वी) की श्रावण की पुण्य तिथि पर स्थापित की गयीं; अनुष्ठान दादा केलकर और उपासनी ने सम्पन्न किया।
पूरा विवरण (बी. वी. देव के अनुसार, साईं लीला, खंड 11 में प्रकाशित): 1912 में बम्बई के डॉ. रामराव कोठारे अपने कम्पाउण्डर और भाई कृष्णाजी के साथ दर्शनार्थ आये। पादुकाओं की रूपरेखा डॉ. कोठारे ने खींची, उपासनी महाराज ने उसमें परिष्कार किया (और उन्होंने यह श्लोक भी जोड़ा: `सदा निम्बवृक्षस्य मूलाधिवासात् / सुधास्राविणं तिक्तमपि अप्रियं तम् / तरुं कल्पवृक्षाधिकं साधयन्तं / नमामीश्वरं सद्गुरुं साईंनाथम्`), पादुकाएँ बम्बई में बनवायी गयीं, कम्पाउण्डर शिरडी ले आये, और श्रावण-पूर्णिमा को प्रातः 11 बजे स्थापना हुई। बाबा ने उन्हें स्पर्श करके कहा: "ये भगवान के चरण हैं।"
जब भाई ने इसके पश्चात अकलकोट जाने की अनुमति माँगी, बाबा बोले: "अरे, अकलकोट में क्या है? वहाँ क्यों जाते हो? उस स्थान के अधिष्ठाता महाराज तो यहाँ हैं — मैं ही।" भाई नहीं गये।
मोहदीन तम्बोली के साथ कुश्ती और वेश-परिवर्तन
बाबा ने मोहदीन तम्बोली के साथ कुश्ती की; बाबा हार गये। उसी दिन से उन्होंने अपना वेश बदल लिया: कफनी, लंगोट, सिर पर कपड़ा, आसन और शय्या के लिए टाट। वे प्रायः कहा करते थे:
"Poverty is better than Kingship, far better than Lordship. The Lord is always brother (befriender) of the poor."
(हिन्दी अर्थ: "दरिद्रता राज्य से उत्तम है, स्वामित्व से कहीं अधिक उत्तम है। प्रभु सदा निर्धन के बन्धु — सखा — हैं।")
जल को तेल में परिणत करना — दीप-प्रसंग
बाबा को रात्रि-काल में मस्जिद और मन्दिर में अनेक दीप जलाये रखने का अत्यन्त प्रिय अभ्यास था। शिरडी के बनिये (दुकानदार), जो उन्हें निःशुल्क तेल देते थे, एक दिन षड्यन्त्र करके इनकार कर बैठे। बाबा अपने टीन के बर्तन में (जिसमें केवल कुछ बूँदें तेल बचा था) लौटे, उसमें जल मिलाया, उसमें से पिया और मुख से वापस बर्तन में उगल दिया — इस प्रकार उसे अभिमन्त्रित कर दिया। तदुपरान्त उन्होंने दीपों को उसी मिश्रण से भरकर जला दिया। दीप रात भर जलते रहे। बनिये प्रातः क्षमा-याचना के लिए आये।
छद्म-गुरु जौहर अली
कुश्ती-प्रसंग के पाँच वर्ष पश्चात विद्वान फ़कीर जौहर अली अहमदनगर से रहाता आये, फिर शिरडी। वे सम्पूर्ण क़ुरान कण्ठाग्र सुना सकते थे। वे बाबा को अपना शिष्य कहने लगे; बाबा ने आपत्ति नहीं की और चेले की भूमिका निभाते रहे। दोनों रहाता लौट गये। शिरडी के भक्त बाबा के विरह से व्याकुल होकर उन्हें लाने गये। बाबा प्रथमतः अस्वीकार कर गये और बताया कि फ़कीर का स्वभाव क्रोधी है। फ़कीर भी प्रकट होकर क्रुद्ध हुए। अन्ततः सब एक साथ शिरडी लौट आये।
कुछ दिनों के पश्चात शिरडी के देवीदास (जो बाबा से बारह वर्ष पहले शिरडी आये थे) ने जौहर अली की परीक्षा ली, उन्हें कमजोर पाया, और जौहर अली बीजापुर भाग गये। कई वर्ष पश्चात जौहर अली पुनः लौटे और साईं बाबा के समक्ष साष्टांग हुए। बाबा ने उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। हेमाडपंत टिप्पणी करते हैं कि बाबा का यह आचरण इस बात का प्रदर्शन था कि एक सच्चा शिष्य गुरु के दोष जानते हुए भी शिष्यता का धर्म कैसे निभाता है — कर्म में निरहंकारता।
इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन
- (पादुकाओं को स्पर्श करते हुए) "These are the feet of the Lord."
(हिन्दी अर्थ: "ये भगवान के चरण हैं।")
- (भाई कृष्णाजी से) "Oh, what is there in Akkalkot? Why do you go there? The incumbent Maharaj of that place is here, Myself."
(हिन्दी अर्थ: "अरे, अकलकोट में क्या है? वहाँ क्यों जाते हो? उस स्थान के अधिष्ठाता महाराज तो यहाँ हैं — मैं ही।")
- (बारम्बार उच्चारित) "Poverty is better than Kingship, far better than Lordship. The Lord is always brother (befriender) of the poor."
(हिन्दी अर्थ: "दरिद्रता राज्य से उत्तम है, स्वामित्व से कहीं अधिक उत्तम है। प्रभु सदा निर्धन के बन्धु — सखा — हैं।")
- (म्हाळसापति का स्वागत-वचन — "साईं" नाम का उद्गम) "Ya Sai" — "Welcome, Sai."
(हिन्दी अर्थ: "या साईं" — "आइए, साईं, स्वागत है।")
- (धूनी के निकट निरन्तर वाणी) "Allah Malik" — "God is the sole owner."
(हिन्दी अर्थ: "अल्लाह मालिक" — "ईश्वर ही एकमात्र स्वामी है।")
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।