Sit With Sai
अन्तरंग भक्त

भगत म्हाळसापति

खण्डोबा-मन्दिर के पुजारी, शिरडी का स्वर्णकार। पहले व्यक्ति जिन्होंने बाबा को 'या साईं' से सम्बोधित किया (लगभग 1858)। बाबा के 14-वर्ष के रात्रि-त्रिकूट के तीसरे सदस्य।

मूल तथ्य

व्यवसायस्वर्णकार; खण्डोबा-मन्दिर के पुजारी
ऐतिहासिक भूमिकाबाबा के 'साईं' नाम के दाता (अध्याय 5)
शय्या-त्रिकूटबाबा (पूर्व), तात्या (पश्चिम), म्हाळसापति (उत्तर) — 14 वर्ष
निर्धनताअत्यन्त निर्धन; बाबा ने उन्हें दक्षिणा-संग्रह से कभी कुछ नहीं दिया

जीवन-प्रसंग

'या साईं' का अभिवादन

लगभग 1858 में, जब चाँद पाटिल की बारात के साथ युवा बाबा शिरडी में खण्डोबा-मन्दिर के समीप वट-वृक्ष के नीचे उतरे, म्हाळसापति ने अकस्मात् कहा — 'या साईं' (आइए, साईं)। यही नाम बाबा का स्थायी सम्बोधन बन गया (अध्याय 5)।

रात्रि-जागरण

बाबा रात्रि में म्हाळसापति से कहते — मेरे पास बैठो, हाथ मेरे हृदय पर रखो, 'प्रभु-नाम-जप' का अवलोकन करो, और यदि मुझे नींद आये तो जगा देना। जब म्हाळसापति को ऊँघ आती और हाथ पत्थर-सम भारी हो जाता, बाबा 'हे भगत!' पुकारकर उन्हें जगाते (अध्याय 45)।

1886 की तीन-दिन की समाधि

मार्गशीर्ष-पूर्णिमा को बाबा ने म्हाळसापति को आदेश दिया — 'मेरा शरीर तीन दिन रक्षित रखो; न लौटूँ तो उस खुली भूमि में दफना देना।' म्हाळसापति अकेले ग्रामवासियों के विरुद्ध तीन दिन गोद में बाबा के शरीर को थामे बैठे रहे (अध्याय 43-44)।

हंसराज का प्रस्ताव

एक बार व्यापारी हंसराज ने अत्यन्त निर्धन म्हाळसापति को बाबा की उपस्थिति में बड़ी राशि देनी चाही — बाबा ने स्वीकार करने नहीं दिया। म्हाळसापति की निर्धनता ही बाबा की उन पर रक्षा थी (अध्याय 36)।

पादुका-स्थापना

1912 की श्रावण-पूर्णिमा पर म्हाळसापति, उपासनी, और दादा केलकर ने मिलकर नीम-वृक्ष के नीचे पादुकाओं की स्थापना सम्पन्न की (अध्याय 5)।

सम्बन्धित अध्याय

अध्याय 05अध्याय 07अध्याय 08अध्याय 36अध्याय 43-44अध्याय 45
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·