Sit With Sai
श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 02
TL;DRदूसरा अध्याय सच्चरित्र की रचना के लिए साईं बाबा द्वारा दी गयी प्रत्यक्ष अनुमति का एकमात्र दर्ज विवरण प्रस्तुत करता है। हेमाडपंत यह प्रश्न सावधानी से रखते हैं: वे यह उल्लेख नहीं करते कि बाबा ने उन्हें स्वयं उनके अपने व्यक्तित्व में अनुमति दी

अध्याय 2 — ग्रन्थ-रचना का प्रयोजन; "हेमाडपंत" उपाधि; गुरु की आवश्यकता

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र (डाभोलकर, 1929), अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai2.html

अनुभाग

ग्रन्थ-रचना का प्रयोजन

हेमाडपंत बताते हैं कि बाबा के चमत्कार (अध्याय 1 के हैजे को पीसने का प्रसंग) को सुनकर उन्हें लिखने की प्रेरणा हुई। वे स्वीकार करते हैं कि यह कार्य धृष्टतापूर्ण है — "अन्य संतों को जानने के लिए स्वयं संत होना अनिवार्य है" — और बाबा की कृपा की याचना करते हैं। वे यह भी उल्लेख करते हैं कि पूर्ववर्ती जीवनी-ग्रन्थ पहले से उपलब्ध हैं (महिपति के भक्त विजय और संत विजय, शक संवत् 1700 के आसपास; दास गणु महाराज के भक्त लीलामृत के अध्याय 31-33 और संत कथामृत का अध्याय 57) — परन्तु क्षेत्र विस्तृत है और एक और प्रयास के लिए स्थान शेष है।

शामा (माधवराव देशपांडे) के माध्यम से बाबा की अनुमति

हेमाडपंत स्वयं बाबा से नहीं पूछ सके, अतः उन्होंने शामा से मध्यस्थता का अनुरोध किया। बाबा ने हेमाडपंत के सिर पर हाथ रखकर और उन्हें उदी देते हुए जो उत्तर दिया वह यह था:

"Let him make a collection of stories and experiences, keep notes and memos; I will help him. He is only an outward instrument… When his ego is completely annihilated and there is left no trace of it, I Myself shall enter into him and shall Myself write My own life… let there be no insistence on establishing one's own view, no attempt to refute other's opinions, no discussions of pros and cons of any subject."

(हिन्दी अर्थ: "वह कथाओं और अनुभवों का संग्रह करे, टिप्पणियाँ और स्मारक-पत्र रखे; मैं उसकी सहायता करूँगा। वह केवल एक बाह्य उपकरण है… जब उसका अहंकार पूर्णतः नष्ट हो जाएगा और उसका कोई चिह्न शेष न रहेगा, तब मैं स्वयं उसमें प्रविष्ट होकर अपना जीवन-चरित स्वयं लिखूँगा… अपनी ही दृष्टि स्थापित करने का आग्रह न हो, अन्यों के मत के खंडन का प्रयास न हो, किसी विषय के पक्ष-विपक्ष में चर्चा न हो।")

लोनावला प्रसंग — शिरडी-यात्रा में विलम्ब का कारण

हेमाडपंत ने काकासाहेब दीक्षित और नानासाहेब चांदोरकर को शिरडी आने का वचन दिया था, परन्तु बार-बार टालते रहे। लोनावला में उनके एक मित्र के पुत्र को कोई गम्भीर रोग लगा; मित्र ने भौतिक और आध्यात्मिक दोनों उपाय किए, यहाँ तक कि अपने गुरु को भी बालक की शय्या के समीप ले आये — किन्तु ज्वर शान्त नहीं हुआ। हेमाडपंत के मन में प्रश्न उठा: "गुरु की उपयोगिता ही क्या है?" — और उन्होंने अपनी यात्रा और भी टाल दी।

नाना चांदोरकर ने उन्हें शिरडी कैसे पहुँचाया

नानासाहेब चांदोरकर, जो प्रान्त-अधिकारी थे, बसई दौरे पर जाने वाले थे और दादर में रेलगाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी एक बान्द्रा लोकल आ गयी; वे उसी से बान्द्रा गये, हेमाडपंत को बुलवाया, और उन्हें उसी रात शिरडी के लिए प्रस्थान करने को राज़ी कर लिया। हेमाडपंत बान्द्रा से रेल पर सवार हुए (योजना थी दादर पर बदलकर मनमाड की गाड़ी पकड़नी), तभी एक मुसलमान अजनबी ने उन्हें बताया कि मनमाड मेल दादर पर नहीं रुकती और उन्हें सीधे बोरीबन्दर जाना होगा। हेमाडपंत स्पष्ट कहते हैं कि उस छोटी सी सलाह के बिना वे अगले दिन शिरडी न पहुँच पाते। वे सन् 1910 ईस्वी में प्रातः 9-10 बजे से पहले शिरडी पहुँचे। उस समय एकमात्र निवास-स्थान साठेवाडा ही था। तात्यासाहेब नूलकर मस्जिद से लौटते हुए उन्हें मिले, उन्होंने बताया कि बाबा वाडे के कोने पर खड़े हैं — हेमाडपंत दौड़े और साष्टांग प्रणाम किया।

तीव्र वाद-विवाद — स्वतंत्र इच्छा बनाम भाग्य

आगमन के दिन ही हेमाडपंत और बालासाहेब भाटे साठे के वाडे में इस प्रश्न पर वाद-विवाद में उलझ पड़े कि क्या गुरु आवश्यक है। हेमाडपंत ने स्वतंत्र इच्छा का पक्ष लिया ("स्वतंत्रता क्यों समर्पित करें?"); भाटे ने भाग्य का पक्ष लिया। चर्चा लगभग एक घंटे चली और थककर समाप्त हुई।

जब सब लोग मस्जिद पहुँचे, बाबा ने काकासाहेब दीक्षित से पूछा:

"What was going on in the Wada? What was the discussion about?" — और हेमाडपंत की ओर दृष्टि कर — "What did this Hemadpant say?"

(हिन्दी अर्थ: "वाडे में क्या चल रहा था? चर्चा किस विषय पर थी? यह हेमाडपंत क्या कह रहा था?")

हेमाडपंत स्तब्ध रह गये: मस्जिद वाडे से दूर थी। बाबा को सम्पूर्ण चर्चा का ज्ञान था।

"हेमाडपंत" उपाधि का इतिहास

हेमाडपंत बताते हैं कि ऐतिहासिक हेमाद्रिपंत देवगिरि (यादव वंश) के राजा महादेव और रामदेव के मन्त्री थे; संस्कृत में विद्वान थे; चतुर्वर्ग चिन्तामणि और राजप्रशस्ति के रचयिता थे; और मोडी (मराठी आशुलिपि) के प्रवर्तक माने जाते हैं। हेमाडपंत स्वयं को उनकी तुलना में "एक अज्ञानी" बताते हैं, और इस उपाधि को अपने अहंकार पर प्रहार रूप में स्वीकार करते हैं — साथ ही सम्भवतः उस दिन के वाद-विवाद में उनकी चतुराई पर एक सूक्ष्म प्रशंसा के रूप में भी। वे टिप्पणी करते हैं कि यह उपाधि भविष्यवाणी सिद्ध हुई: आगे चलकर उन्होंने ही साईं संस्थान के लेखे-जोखे का प्रबन्धन किया और सच्चरित्र की रचना की।

गुरु की आवश्यकता पर — काकासाहेब दीक्षित की टिप्पणियाँ

हेमाडपंत ने स्वयं इस विषय पर बाबा के शब्द दर्ज नहीं किए, परन्तु काकासाहेब दीक्षित ने अपनी टिप्पणियाँ प्रकाशित कीं (साईं लीला, खंड 1, अंक 5, पृष्ठ 47)। हेमाडपंत की भेंट के अगले दिन काकासाहेब ने बाबा से पूछा कि क्या वे शिरडी छोड़ दें। संवाद इस प्रकार था:

हेमाडपंत ने इसी को गुरु-प्रश्न का बाबा-कृत उत्तर माना। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि स्वतंत्र इच्छा बनाम बन्धन की केवल चर्चा निष्फल है; वास्तविक प्रगति गुरु के मार्गदर्शन से ही होती है — और इसके लिए वे राम (वसिष्ठ) तथा कृष्ण (सान्दीपनि) के दृष्टान्त देते हैं — और इसमें केवल दो गुण अपेक्षित हैं: श्रद्धा और सबूरी

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. "Let him make a collection of stories and experiences, keep notes and memos; I will help him. He is only an outward instrument."

(हिन्दी अर्थ: "वह कथाओं और अनुभवों का संग्रह करे, टिप्पणियाँ और स्मारक-पत्र रखे; मैं उसकी सहायता करूँगा। वह केवल एक बाह्य उपकरण है।")

  1. "When his ego is completely annihilated… I Myself shall enter into him and shall Myself write My own life."

(हिन्दी अर्थ: "जब उसका अहंकार पूर्णतः नष्ट हो जाएगा… तब मैं स्वयं उसमें प्रविष्ट होकर अपना जीवन-चरित स्वयं लिखूँगा।")

  1. "What was going on in the Wada? What was the discussion about? What did this Hemadpant say?"

(हिन्दी अर्थ: "वाडे में क्या चल रहा था? चर्चा किस विषय पर थी? यह हेमाडपंत क्या कह रहा था?")

  1. (काकासाहेब को, गुरु की आवश्यकता पर) "There are many ways… If there be no guide, there is the danger of your being lost in the jungles or falling into ditches."

(हिन्दी अर्थ: "अनेक मार्ग हैं… यदि पथ-प्रदर्शक न हो, तो जंगल में भटक जाने या गड्ढे में गिर जाने का खतरा है।")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·