Sit With Sai
श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 20
TL;DRबीसवाँ अध्याय सच्चरित्र में बाबा की शिक्षण-पद्धति का सर्वाधिक सुरुचिपूर्ण उदाहरण है। दास गणु महाराज — विद्वान और सक्षम — अपने मराठी ईशावास्य-उपनिषद् भाष्य पर अटक गये थे — वह संक्षिप्त यजुर्वेदीय कथन कि प्रभु सर्वत्र व्याप्त हैं, और इसीलिए म

अध्याय 20 — दास गणु की ईशावास्य-समस्या; काकासाहेब की दासी द्वारा समाधान

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai20.html

अनुभाग

ईशावास्य-उपनिषद् — दास गणु की कठिनाई

दास गणु ने मराठी 'ओवी' छन्द में ईशावास्य-उपनिषद् (यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता का 40वाँ अध्याय) पर भाष्य का संकल्प लिया था। उन्होंने श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद किया, परन्तु संतुष्ट नहीं हुए: उपनिषद् के ज्ञान-कर्म का संक्षिप्त समन्वय — यह कथन कि प्रभु सर्व-व्याप्त हैं, और इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि जो दिया है उसका आनन्द ले और अन्य की वस्तु की लालसा न करे — उनकी लेखनी से दूर ही रह गया। उन्होंने विद्वानों से परामर्श किया; कोई संतोषजनक व्याख्या न दे सका। वे शिरडी आये और कठिनाई बाबा के सम्मुख रखी।

बाबा का उत्तर:

"You need not be anxious. There is no difficulty about the matter. The maid-servant of Kaka (Kakasaheb Dixit) will solve your doubts at Vile Parle on your way home."

(हिन्दी अर्थ: "तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। इस विषय में कोई कठिनाई नहीं। घर लौटते समय विले-पारले में काका (काकासाहेब दीक्षित) की दासी तुम्हारी शंकाएँ हल कर देगी।")

सुनने वाले समझे कि बाबा हँसी कर रहे हैं — "एक अनपढ़ दासी इस प्रकार की कठिनाइयाँ कैसे हल कर सकती है?" — परन्तु दास गणु को विश्वास था कि बाबा का वचन सत्य ही उतरेगा।

दासी का गीत

दास गणु विले-पारले (बम्बई का उपनगर) गये और काकासाहेब दीक्षित के घर ठहरे। अगले प्रातः उन्होंने एक छोटी बालिका को मधुर स्वर में गाते सुना — काकासाहेब के सेवक नाम्या की बहन। उसका गीत एक सुन्दर लाल साड़ी की प्रशंसा में था: कशीदाकारी कितनी अच्छी, छोर-किनारे कितने सुन्दर। वह बर्तन माँज रही थी, और केवल एक फटी-पुरानी चिथड़ी पहने हुए थी।

करुणा से दास गणु ने इसका उल्लेख राव बहादुर एम. वी. प्रधान से किया, जो अगले दिन दास गणु को धोतियाँ देने वाले थे; दास गणु ने अनुरोध किया कि वे बालिका के लिए एक साड़ी भी जोड़ दें। राव बहादुर ने एक सुन्दर चिरडी (छोटी साड़ी) ख़रीदी और उसे दे दी।

बालिका ने अगले दिन नयी साड़ी पहनी, अन्य बालिकाओं के साथ नाची, चक्कर लगाये, और फुगडी खेली। उसके अगले दिन उसने नयी साड़ी अपनी पेटी में रख दी और पुनः अपनी पुरानी चिथड़ी में आ गयी — परन्तु उतनी ही प्रसन्न जितनी पिछले दिन थी।

दास गणु का बोध

चिन्तन के पश्चात दास गणु को बोध हुआ: बालिका का नयी साड़ी पर आनन्द और उसके बिना का संतोष — दोनों एक ही थे। सुख-दुःख के सब अनुभव चित्त की वृत्ति पर निर्भर हैं। प्रभु जो भी प्रदान करें उसका इस दृढ़ विश्वास के साथ आनन्द लेना कि दाता प्रभु ही हैं — और दूसरे की वस्तु की लालसा न करना — यही ईशावास्य की शिक्षा थी। हेमाडपंत इसे उपनिषद् का "व्यावहारिक प्रदर्शन" कहते हैं: फटी चिथड़ी में निर्धन बालिका, नयी साड़ी, दाता, नृत्य, और स्वीकार — सब प्रभु के ही अंश थे, सब उन्हीं से व्याप्त।

बाबा की पद्धति

हेमाडपंत बाबा की शिक्षण-शैली पर टिप्पणी करते हैं: यद्यपि बाबा ने कभी शिरडी नहीं छोड़ी, उन्होंने कुछ भक्तों को साधना के लिए मच्छिन्द्रगढ़ भेजा, अन्यों को कोल्हापुर अथवा शोलापुर। कुछ को वे अपने सामान्य रूप में दिखे; कुछ को जाग्रत अथवा स्वप्न-अवस्था में, दिन या रात के किसी भी क्षण। इस प्रसंग में शिक्षा विले-पारले में, एक अनाम निर्धन बालिका में स्थापित की गयी।

मध्याह्न-आरती के पश्चात बाबा की रीति पर एक टिप्पणी

हेमाडपंत मध्याह्न-आरती के समापन पर बाबा का एक संक्षिप्त चित्र भी देते हैं: मस्जिद के किनारे खड़े होकर भक्तों की हथेलियों में मुट्ठी भर-भर उदी डालते, उँगलियों से उनके मस्तकों पर तिलक करते, और प्रत्येक को नाम लेकर घर भेजते —

"Oh Bhau, go to take your lunch; you Anna, go to your lodgings; you Bapu, enjoy your dishes."

(हिन्दी अर्थ: "अरे भाऊ, अपना भोजन करने जाओ; तुम अन्ना, अपने आवास जाओ; तुम बापू, अपने व्यंजनों का आनन्द लो।")

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. (दास गणु से ईशावास्य-उपनिषद् पर) "You need not be anxious. There is no difficulty about the matter. The maid-servant of Kaka will solve your doubts at Vile Parle on your way home."

(हिन्दी अर्थ: "तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। इस विषय में कोई कठिनाई नहीं। घर लौटते समय विले-पारले में काका की दासी तुम्हारी शंकाएँ हल कर देगी।")

  1. (मध्याह्न-आरती के समापन पर, नाम लेकर भक्तों को घर भेजते हुए) "Oh Bhau, go to take your lunch; you Anna, go to your lodgings; you Bapu, enjoy your dishes."

(हिन्दी अर्थ: "अरे भाऊ, अपना भोजन करने जाओ; तुम अन्ना, अपने आवास जाओ; तुम बापू, अपने व्यंजनों का आनन्द लो।")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·