अध्याय 14 — नांदेड़ के रत्तनजी वाडिया; संत मौलीसाहेब; दक्षिणा-मीमांसा
स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html
मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai14.html
अनुभाग
नांदेड़ के रत्तनजी वाडिया — निःसन्तानता का निवारण
नांदेड़ (निज़ाम राज्य) के रत्तनजी शापुरजी वाडिया एक धनी पारसी मिल-कारक थे — सम्पत्ति, सेवक — परन्तु कोई सन्तान नहीं। कई वर्षों की चिन्ता के पश्चात उन्होंने अपना दुःख दास गणु महाराज के समक्ष खोला, जिन्होंने शिरडी जाने का परामर्श दिया। वे आये, साष्टांग हुए, बाबा के कण्ठ में माला डाली, और फल अर्पित किए।
बाबा ने 5 रुपये दक्षिणा माँगी। रत्तनजी उतनी राशि देना चाहते भी थे; परन्तु बाबा ने जोड़ा:
"I have already received Rs. 3-14-0 from you; pay the balance only."
(हिन्दी अर्थ: "मैंने तुमसे पहले ही 3 रुपये 14 आने प्राप्त कर लिए हैं; केवल बाक़ी भर दो।")
रत्तनजी हतप्रभ रह गये — यह उनकी प्रथम भेंट थी। उन्होंने शेष राशि चुकायी, पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की, और बाबा का आशीर्वाद उदी सहित प्राप्त किया।
नांदेड़ लौटकर उन्होंने बाबा के विचित्र वचन के विषय में दास गणु को बताया। दास गणु चिन्तन में लीन हो गये। उन्हें स्मरण हो आया कि रत्तनजी ने हाल ही में मुसलमान मज़दूर-संत मौलीसाहेब का अपने घर सत्कार किया था, और कुछ अल्प व्यय किया था। उस सत्कार की यादी (व्यय-स्मरण-पत्र) ठीक 3 रुपये 14 आने की निकली — न अधिक, न कम। बाबा ने दूरी के पार स्वयं को मौलीसाहेब के साथ एकात्म कर लिया था।
समयानुसार रत्तनजी को सन्तान-सुख प्राप्त हुआ। उन्हें कुल बारह सन्तानें हुईं, जिनमें से चार जीवित रहीं।
(पाद-टिप्पणी: इसी प्रकार बाबा ने राव बहादुर हरि विनायक साठे से कहा था कि अपनी प्रथम पत्नी की मृत्यु के पश्चात वे पुनर्विवाह करें, और उन्हें पुत्र प्राप्त होगा। दो पुत्रियों के पश्चात उनकी तीसरी सन्तान पुत्र हुई।)
दक्षिणा-मीमांसा (बाबा माँगते क्यों थे)
लम्बे काल तक बाबा कुछ स्वीकार नहीं करते थे; वे जली हुई माचिस की काठियाँ बटोरकर अपनी जेब में भरते रहते थे। कोई पैसा रखता, तो जेब में डाल लेते; दो पैसे का सिक्का लौटा देते। ख्याति बढ़ने पर वे दक्षिणा माँगने लगे।
हेमाडपंत मूल सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं: बृहदारण्यक उपनिषद् "द" अक्षर की तीन दिशाओं में शिक्षा देता है — देवताओं के लिए दम (आत्म-संयम); मनुष्यों के लिए दान (दान); और राक्षसों के लिए दया (करुणा)। मनुष्यों के लिए निर्धारित साधना दान है।
दो उल्लेखनीय प्रसंग जहाँ बाबा को धन की कामना नहीं थी:
- प्रो. जी. जी. नार्के। बाबा ने 15 रुपये दक्षिणा माँगी। नार्के के पास धन नहीं था। बाबा बोले:
> "I know you have no money; but you are reading Yoga-Vashistha. Give Me Dakshina from that."
(हिन्दी अर्थ: "मैं जानता हूँ तुम्हारे पास धन नहीं है; परन्तु तुम योग-वासिष्ठ पढ़ रहे हो। उसी में से मुझे दक्षिणा दो।") (अभिप्राय: ग्रन्थ की शिक्षा अपने हृदय में स्थापित करो — वहीं बाबा निवास करते हैं।)
- श्रीमती आर. ए. तारखड। बाबा ने 6 रुपये माँगे। उन्हें दुःख हुआ — कुछ था ही नहीं। उनके पति ने व्याख्या की: बाबा को छह आन्तरिक शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) समर्पित कराने थे। बाबा ने इस व्याख्या को स्वीकार किया।
हेमाडपंत टिप्पणी करते हैं: यद्यपि बाबा ने एक दशक में हज़ारों रुपये एकत्र किए, प्रत्येक दिन का संग्रह उसी दिन वितरित कर देते थे — और महासमाधि के समय उनके पास केवल कुछ रुपये बचे थे।
बी. वी. देव का लेख (अनुबन्ध)
बी. वी. देव के लेख का सारांश (साईं लीला, खंड VII, पृष्ठ 6-26):
- बाबा सब से दक्षिणा नहीं माँगते थे। कुछ से छोटी राशि, कुछ से बड़ी; कुछ स्त्रियों से, कुछ बच्चों से, कुछ धनी और कुछ निर्धन से।
- वे इनकार करने वालों पर कभी क्रुद्ध नहीं होते थे; यदि उनकी इच्छा के विरुद्ध धन रखा जाता, तो छूते भी नहीं।
- बाबा कभी-कभी राशि का एक भाग दानदाता को लौटा देते, और कहते कि "इसकी रक्षा करना" अथवा अपने देव-स्थान पर रखना — यह विधि दानदाता के हित में होती।
- सम्पूर्ण संग्रह में से बाबा अपने ऊपर अत्यल्प व्यय करते थे: केवल चिलम और धूनी का ईंधन। शेष लगभग सब उसी सायं दान के रूप में निकल जाता।
- बाबा ने नानासाहेब चांदोरकर से कहा था कि उनकी समस्त सम्पत्ति एक कौपीन, एक फटा-पुराना वस्त्र, एक कफनी और एक टमरेल — इतनी ही है; वे महँगी भेंटों पर आपत्ति करते थे।
"Woman and wealth are the two main obstacles in the way of our Pramartha (spiritual life)."
(हिन्दी अर्थ: "स्त्री और धन — ये दो परमार्थ (आध्यात्मिक जीवन) के मार्ग में मुख्य बाधाएँ हैं।")
शिरडी में बाबा की दो "संस्थाएँ" थीं — दक्षिणा और राधा-कृष्ण माई का घर ("पाठशाला") — आसक्ति की दो परीक्षाएँ।
इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन
- (रत्तनजी वाडिया से) "I have already received Rs. 3-14-0 from you; pay the balance only."
(हिन्दी अर्थ: "मैंने तुमसे पहले ही 3 रुपये 14 आने प्राप्त कर लिए हैं; केवल बाक़ी भर दो।")
- (प्रो. जी. जी. नार्के से) "I know you have no money; but you are reading Yoga-Vashistha. Give Me Dakshina from that."
(हिन्दी अर्थ: "मैं जानता हूँ तुम्हारे पास धन नहीं है; परन्तु तुम योग-वासिष्ठ पढ़ रहे हो। उसी में से मुझे दक्षिणा दो।")
- (निरन्तर शिक्षा) "Woman and wealth are the two main obstacles in the way of our Pramartha."
(हिन्दी अर्थ: "स्त्री और धन — ये दो परमार्थ के मार्ग में मुख्य बाधाएँ हैं।")
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।