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श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 08
TL;DRआठवाँ अध्याय सच्चरित्र में नित्य-जीवन के बाबा का चित्र है — एक ग्राम-फ़कीर, जिसकी समस्त धर्म-दृष्टि सर्वाधिक साधारण कर्मों में अभिव्यक्ति पाती है। हेमाडपंत अध्याय का आरम्भ मानव-जन्म की दुर्लभता और महत्त्व पर एक दीर्घ दार्शनिक चिन्तन से करते

अध्याय 8 — मानव-जन्म का महत्त्व; बाबा का भिक्षाटन; बायजाबाई; तीन की शय्या-व्यवस्था; खुशालचन्द

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai8.html

अनुभाग

मानव-जन्म का महत्त्व

हेमाडपंत की प्रारम्भिक शिक्षा: हिन्दू-गणना में जिन चौरासी लाख योनियों का उल्लेख है, उनमें से एकमात्र मानव-जन्म ही उस ज्ञान-शक्ति से सम्पन्न है जिसके द्वारा ईश्वर-दर्शन सम्भव है। वे संक्षेप में कहते हैं: शरीर को क्षणभंगुर मानकर तिरस्कृत भी न करो, और न इसकी उपयोगिता के कारण इसका लालन करो — गृह-यात्रा में अश्व की देखभाल करने वाले यात्री की भाँति इसका ध्यान रखो।

बाबा का भिक्षाटन

बाबा शिरडी में प्रति दिन घर-घर भिक्षा माँगा करते थे। एक हाथ में टमरेल (टीन का बर्तन), दूसरे में ज़ोली (फ़कीर-शैली का आयताकार वस्त्र-थैला) रहता। तरल भिक्षा (पीठले, सब्जी-शोरबा, दूध, छाछ) टीन के बर्तन में जाती; पकाये हुए चावल, रोटी और ठोस ज़ोली में। उनकी जिह्वा को स्वाद का बोध नहीं था — सब वस्तुएँ एक साथ मिलाकर बिना किसी टिप्पणी के खा ली जाती थीं।

उनका भिक्षाटन नियमित नहीं था: कुछ दिन कुछ ही चक्कर, और कुछ दिन दोपहर तक चलते रहते। एकत्रित भोजन एक `कुण्डी` (मिट्टी के पात्र) में डाल दिया जाता। कुत्ते, बिल्लियाँ और कौवे निर्बाध खाते रहते — वे कभी भगाते नहीं थे। मस्जिद की झाड़ू लगाने वाली स्त्री दस-बारह रोटी के टुकड़े अपने घर ले जाती थी; कोई उसे रोकता नहीं था।

बायजाबाई की सेवा

तात्या कोते पाटिल की माता बायजाबाई प्रति दोपहर सिर पर रोटी और सब्जी की टोकरी लेकर जंगल जाती थीं, कोस-कोस पार करके बाबा को खोजती थीं। उन्हें वे ध्यानस्थ बैठे मिलते; वे एक पत्ता उनके सम्मुख बिछातीं, भोजन उँडेलतीं, और बलपूर्वक खिलातीं। यह क्रम कई वर्षों तक चला। बाबा ने उनकी सेवा कभी नहीं भुलायी। बाद के वर्षों में जब बाबा ग्राम में रहने लगे और मस्जिद में ही भोजन करने लगे, उनकी जंगल-यात्रा समाप्त हो गयी।

बाबा प्रायः उनसे और उनके पुत्र से कहा करते थे:

"Fakir (Mendicancy) was the real Lordship, as it was everlasting; and the so-called Lordship (riches) was transient."

(हिन्दी अर्थ: "फ़कीरी (भिक्षावृत्ति) ही वस्तुतः स्वामित्व है, क्योंकि वह शाश्वत है; तथाकथित स्वामित्व (धन-सम्पदा) क्षणभंगुर है।")

तीनों की शय्या-व्यवस्था

चौदह वर्षों तक बाबा, तात्या कोते पाटिल, और भगत म्हाळसापति मस्जिद में पास-पास सोते थे — सिर क्रमशः पूर्व, पश्चिम और उत्तर की ओर, और पैर मध्य में मिले हुए। रात्रि-गहरी होने तक वार्तालाप चलता रहता; यदि कोई खर्राटे लेने लगे, तो दूसरे उसे उठा देते। तात्या के खर्राटों पर बाबा उन्हें हिलाते और उनके सिर को दबाते; म्हाळसापति के खर्राटों पर बाबा उन्हें आलिंगन में लेते, पैर सहलाते, और पीठ की मालिश करते। तात्या अपने माता-पिता को घर छोड़कर बाबा के पास मस्जिद में सोने आते थे; पिता की मृत्यु के पश्चात वे अपने घर लौटकर सोने लगे।

रहाता के खुशालचन्द

बाबा का शिरडी के गणपत कोते पाटिल से अत्यन्त स्नेह था। उतना ही प्रेम वे रहाता के चन्द्रभानशेठ मारवाड़ी से करते थे; उनके निधन के पश्चात उनके भतीजे खुशालचन्द को वही स्नेह अनुगत हुआ। बाबा अन्तरंग मित्रों के साथ बैलगाड़ी अथवा ताँगा से रहाता जाते; ग्राम बैण्ड-बाजों के साथ द्वार पर उनका स्वागत करता; और खुशालचन्द उन्हें घर पर भोजन के लिए आसन देते।

शिरडी रहाता (दक्षिण) और निमगाँव (उत्तर) के मध्य में स्थित है, और बाबा ने अपने जीवन-काल में कभी इन दोनों स्थानों के बाहर पाँव नहीं रखा। उन्होंने कभी रेलगाड़ी नहीं देखी, और न उससे यात्रा की — परन्तु सब गाड़ियों के आगमन-प्रस्थान का सटीक समय जानते थे। जो भक्त बाबा के यात्रा-निर्देशों का पालन करते, वे सकुशल रहते; जो उपेक्षा करते, उन्हें विपत्तियाँ झेलनी पड़तीं।

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. (किसी घर के द्वार पर भिक्षा-स्वागत में) "Oh Lassie, give Me a piece of bread."

(हिन्दी अर्थ: "अरी पुत्री, मुझे रोटी का एक टुकड़ा दे दे।")

  1. (बायजाबाई और तात्या से) "Fakir (Mendicancy) was the real Lordship, as it was everlasting; and the so-called Lordship (riches) was transient."

(हिन्दी अर्थ: "फ़कीरी (भिक्षावृत्ति) ही वस्तुतः स्वामित्व है, क्योंकि वह शाश्वत है; तथाकथित स्वामित्व (धन-सम्पदा) क्षणभंगुर है।")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·