Sit With Sai
श्री साईं सच्चरित्र · अध्याय 24
TL;DRचौबीसवाँ अध्याय सच्चरित्र का "हास्य" अध्याय है — और हेमाडपंत के हाथों एक गहन शिक्षा का सर्वाधिक मितव्ययी कथन: किसी भी इन्द्रिय-सुख का सेवन गुरु को अर्पित किए बिना नहीं करना चाहिए। प्रारम्भिक प्रसंग आत्म-कथात्मक है — रविवार के बाज़ार-दिन मस्

अध्याय 24 — बाबा का विनोद और मधुर हास्य: चना-लीला; सुदामा; अन्ना बनाम मावसीबाई

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html

मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai24.html

अनुभाग

प्रास्ताविक

हेमाडपंत अहंकार के विरुद्ध चेतावनी देते हैं: यह कहना भी कि "अगले अध्याय में अमुक बात बतायेंगे" — एक अहंकार-रूप है। सद्गुरु के चरणों में अहंकार समर्पित करने से ही उपक्रम सफल होता है। बाबा की पूजा से भक्त लौकिक और परमार्थिक — दोनों लक्ष्य प्राप्त करते हैं, और अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर होते हैं।

चना-लीला — हेमाडपंत की आस्तीन में चने

शिरडी में एक रविवार: बाज़ार-दिन। मस्जिद घुटन की हद तक भीड़ से भरी थी। हेमाडपंत बाबा के सम्मुख बैठे उनके पैर दबा रहे थे और हरि-नाम जप रहे थे। शामा (बाबा की बायीं ओर), वामनराव (दायीं ओर), श्रीमान बूटी, काकासाहेब दीक्षित आदि उपस्थित थे।

शामा हँसे: "देख, तेरे कोट की आस्तीन में कुछ दाने अटके दिख रहे हैं।" जब हेमाडपंत ने अपनी बायीं बाँह सीधी की, चने के कुछ दाने लुढ़ककर बाहर आ गिरे — सब के विस्मय के लिए। कोई समझा नहीं सका कि वहाँ कैसे पहुँचे।

बाबा बोले:

"This fellow (Annasaheb) has got the bad habit of eating alone. Today is a bazar-day and he was here chewing grams. I know his habit and these grams are a proof of it. What wonder is there in this matter?"

(हिन्दी अर्थ: "यह व्यक्ति (अन्नासाहेब) अकेले खाने की कुटेव रखता है। आज बाज़ार-दिन है — यह यहाँ बैठा-बैठा चने चबा रहा था। मैं इसकी आदत जानता हूँ — ये दाने उसी का प्रमाण हैं। इसमें आश्चर्य की क्या बात?")

हेमाडपंत ने विरोध किया: वे बाज़ार नहीं गये थे; वे कभी अकेले नहीं खाते। बाबा का उत्तर अध्याय की मूल शिक्षा थी:

"It is true that you give to the persons present; but if none be near-by, what could you or I do? But do you remember Me before eating? Am I not always with you? Then do you offer Me anything before you eat?"

(हिन्दी अर्थ: "यह तो सत्य है कि तुम पास उपस्थित लोगों को देते हो; परन्तु यदि कोई पास न हो, तुम क्या कर सकते हो — और मैं? पर क्या तुम खाने से पूर्व मेरा स्मरण करते हो? क्या मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ सदा? तो क्या खाने से पहले मुझे कुछ अर्पित करते हो?")

तात्पर्य

हेमाडपंत की व्याख्या: इन्द्रियों, मन और बुद्धि के अपने विषयों का भोग करने से पूर्व उन्हें गुरु का स्मरण करना चाहिए — यह स्मरण स्वयं एक अर्पण-रूप है। काम, क्रोध और लोभ की सब वृत्तियाँ पहले गुरु की ओर मोड़ी जायें। तब "क्या यह विषय भोग के योग्य है?" यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेगा; जो अयोग्य है उसका त्याग होगा; दुष्ट आदतें मिटेंगी; शुद्ध ज्ञान फूटेगा। गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं; जो भेद देखता है वह ईश्वर को कहीं नहीं देखता। जब बाबा का स्वरूप मन-दृष्टि के समक्ष स्थिर हो जाता है, क्षुधा, तृषा, और सांसारिक सुखों का बोध — सब विलीन हो जाते हैं।

सुदामा की कथा

वही शिक्षा भागवत के एक समानान्तर के रूप में। श्री कृष्ण, बलराम और सहपाठी सुदामा अपने गुरु सान्दीपनि के आश्रम में निवास करते थे। एक बार तीनों को ईंधन के लिए वन भेजा गया; सान्दीपनि की पत्नी ने सुदामा को कुछ चने दिए कि भाइयों में बाँट देना।

वन में कृष्ण बोले: "दादा, मुझे प्यास लगी है; मुझे जल चाहिए।" सुदामा ने उत्तर दिया: "ख़ाली पेट जल हानिकारक है; थोड़ी देर विश्राम कर लें।" चनों का उल्लेख नहीं किया। जब कृष्ण सुदामा की गोद में सिर रखकर सोने का अभिनय कर खर्राटे लेने लगे, सुदामा ने चने निकालकर खाने आरम्भ कर दिए।

कृष्ण ने सहसा पूछा: "दादा, तुम क्या खा रहे हो? यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?" सुदामा ने झूठ कहा: "क्या खाने को है? मैं तो शीत से काँप रहा हूँ, मेरे दाँत बज रहे हैं। मैं तो विष्णु-सहस्र-नाम भी स्पष्ट नहीं कह पा रहा।"

सर्वज्ञ कृष्ण बोले: "अभी मुझे एक स्वप्न आया — जिसमें मैंने देखा कि एक व्यक्ति किसी और की वस्तु खा रहा था, और जब पूछा गया तो उसने कहा: 'वह कौन-सी मिट्टी खाये?' दूसरे व्यक्ति ने कहा: 'जैसा तुम कहो वैसा हो।' दादा, यह केवल स्वप्न है। मैं जानता हूँ कि तुम मेरे बिना कुछ नहीं खाओगे; स्वप्न के प्रभाव में मैंने तुमसे पूछा कि तुम क्या खा रहे हो।"

परिणाम: यदि सुदामा कृष्ण की सर्वज्ञता जानते होते, तो ऐसा कर्म कभी न करते। आगे का जीवन उन्होंने घोर निर्धनता में बिताया। जब अन्ततः उन्होंने अपनी पत्नी द्वारा अपनी मेहनत से कमाये गये एक मुट्ठी पोहे कृष्ण को अर्पित किए, कृष्ण प्रसन्न हुए और उन्हें स्वर्ण-नगरी प्रदान की।

श्रुति की शिक्षा भी यही है: पहले ईश्वर को अर्पित करो; केवल वही भोग करो जिसे ईश्वर त्याग दें। बाबा की आस्तीन-वाले चने भी यही पाठ थे, हास्य में लपेटे हुए।

अन्ना चिंचणीकर बनाम मावसीबाई

दामोदर घनश्याम बाबरे उपनाम अन्ना चिंचणीकर — सरल, रूखे, सीधे, सब लेन-देन में नकद; बाह्य रूप से कठोर, परन्तु सहज और निष्कपट। बाबा उन्हें प्रिय मानते थे।

एक दोपहर वे झुककर बाबा की बायीं बाँह दबा रहे थे (जो कठाडा-कठेरे पर टिकी थी)। दायीं ओर एक वृद्धा विधवा वेणुबाई कौजलगी — जिन्हें बाबा माता कहते थे और अन्य भक्त मावसीबाई (मौसी) — दोनों हाथों से बाबा का उदर इतने बल से दबा रही थीं कि बाबा एक-तरफ़ से दूसरी-तरफ़ हिल रहे थे। मावसीबाई का मुख अपने प्रहारों के साथ ऊपर-नीचे होता; एक बार अन्ना के मुख के निकट आ गया।

हास-व्यंग्य-स्वभाव की वे बोल पड़ीं: "अरे, यह अन्ना तो बड़ा बेशर्म है — मेरा चुम्बन लेना चाहता है। पकेबाल का बूढ़ा होकर भी मेरा चुम्बन लेने में लज्जा नहीं!"

अन्ना ने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ायीं: "तुम कहती हो कि मैं वृद्ध-दुष्ट हूँ — क्या मैं इतना मूर्ख हूँ? तुम्हीं ने तो झगड़ा छेड़ा।"

बाबा — दोनों से समान स्नेह रखते थे — मृदु-स्वर में बोले:

"Oh Anna, why are you unnecessarily raising this hue and cry? I do not understand what harm or impropriety is there, when the mother is kissed?"

(हिन्दी अर्थ: "अरे अन्ना, तुम व्यर्थ ही यह शोर क्यों मचा रहे हो? मुझे समझ नहीं आता — माता का चुम्बन लेने में क्या हानि अथवा अनुचितता है?")

दोनों संतुष्ट हो गये; उपस्थित सब हँस पड़े।

बाबा की भक्तों पर निर्भरता — सट्का-प्रसंग

बाबा प्रत्येक भक्त को अपनी रीति से सेवा करने देते थे, और हस्तक्षेप सहन नहीं करते थे। एक अन्य अवसर पर जब मावसीबाई बाबा का उदर अपनी सामान्य शक्ति से दबा रही थीं, अन्य भक्त चिन्तित होकर बोले: "अरे माते, थोड़ा विचार रखो — तुम बाबा की नसें-धमनियाँ तोड़ डालोगी।"

बाबा अपने आसन से उठ खड़े हुए और अपना सट्का भूमि पर पटक दिया; उनकी आँखें जलते कोयले-सी लाल हो गयीं। किसी का सामने आने का साहस न हुआ। उन्होंने दो-तीन फ़ुट का सट्का लिया, एक छोर अपने उदर के गड्ढे में दबाया, दूसरा छोर एक खम्भे पर टिकाया, और अपने उदर से उस पर दबाव डालने लगे — सट्का जैसे उनके भीतर समाता दिख रहा था। भक्त निःशब्द भय से खड़े रहे कि कहीं फटाव न हो जाये। बाबा ने यह अपने भक्त के लिए सहा। सौभाग्य से क्रोध शीघ्र शान्त हुआ; उन्होंने सट्का रखा और पुनः आसन ग्रहण किया।

उस दिन से भक्त यह सीख गये कि कभी इस बात में हस्तक्षेप न करें कि अन्य कोई बाबा की सेवा कैसे कर रहा है। केवल बाबा ही उन्हें अर्पित सेवा के गुण और मूल्य के निर्णायक थे।

इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन

  1. (सब के सम्मुख हेमाडपंत के विषय में) "This fellow (Annasaheb) has got the bad habit of eating alone. Today is a bazar-day and he was here chewing grams."

(हिन्दी अर्थ: "यह व्यक्ति (अन्नासाहेब) अकेले खाने की कुटेव रखता है। आज बाज़ार-दिन है — यह यहाँ बैठा-बैठा चने चबा रहा था।")

  1. (हेमाडपंत से, अध्याय की शिक्षा) "It is true that you give to the persons present; but if none be near-by, what could you or I do? But do you remember Me before eating? Am I not always with you? Then do you offer Me anything before you eat?"

(हिन्दी अर्थ: "यह तो सत्य है कि तुम पास उपस्थित लोगों को देते हो; परन्तु यदि कोई पास न हो — पर क्या तुम खाने से पूर्व मेरा स्मरण करते हो? क्या मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ सदा? तो क्या खाने से पहले मुझे कुछ अर्पित करते हो?")

  1. (अन्ना-मावसीबाई के विवाद को सुलझाते हुए) "Oh Anna, why are you unnecessarily raising this hue and cry? I do not understand what harm or impropriety is there, when the mother is kissed?"

(हिन्दी अर्थ: "अरे अन्ना, तुम व्यर्थ ही यह शोर क्यों मचा रहे हो? मुझे समझ नहीं आता — माता का चुम्बन लेने में क्या हानि अथवा अनुचितता है?")

स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, गोविन्द रघुनाथ डाभोलकर (हेमाडपंत), 1929। अंग्रेज़ी अनुवाद: न. वि. गुणाजी।
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।
सम्पादक: सिट विद् साईं सम्पादकीय · सम्पादकीय सिद्धान्त ·