अध्याय 48 — सद्गुरु के लक्षण; शेवड़े का आत्म-विश्वास; सपटनेकर परिवार और पुत्र
स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html
मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai48.html
अनुभाग
प्रास्ताविक — सद्गुरु के लक्षण
हेमाडपंत का सद्गुरु के विषय में सर्वाधिक स्पष्ट कथन:
सद्गुरु नहीं: जो वेद-वेदान्त अथवा षट्शास्त्र पढ़ाये; जो प्राणायाम करे, अथवा शरीर पर मुद्राएँ (धात्विक विष्णु-शस्त्र-चिह्न) अंकित करे, अथवा ब्रह्म पर मधुर प्रवचन दे; जो मन्त्र दे जप-संख्या सहित परन्तु फल का आश्वासन न दे; जो परम-तत्त्व की मधुर व्याख्या करे परन्तु स्वयं आत्म-साक्षात्कारी न हो।
सच्चा सद्गुरु:
- इस लोक और परलोक के भोगों के प्रति अरुचि उत्पन्न करते हैं
- शिष्य को आत्म-साक्षात्कार का स्वाद देते हैं
- सैद्धान्तिक और व्यावहारिक — दोनों ज्ञानों में पारंगत हैं
- शिष्य से सेवा अथवा लाभ अपेक्षित नहीं — उनकी सेवा करना चाहते हैं
- स्वयं को महान और शिष्य को छोटा नहीं मानते
- शिष्य को पुत्र-समान प्रेम करते हैं, समान अथवा ब्रह्म-तुल्य मानते हैं
- शान्ति के निवास हैं; कभी अशान्त, कभी विचलित नहीं
- विद्या का गर्व नहीं
- निर्धन-धनी, छोटे-बड़े को समान मानते हैं
बाबा की योग्यताएँ
हेमाडपंत बाबा को ये योग्यताएँ देते हैं: बाबा ने चिलम के अतिरिक्त कुछ संचित नहीं किया; उनका न परिवार था, न मित्र, न घर, न आधार; 18 वर्ष की आयु से उनका मन-नियन्त्रण पूर्ण था; वे एकान्त में निर्भय रहते, अपनी आत्मा में स्थित। भक्तों की शुद्ध आसक्ति देखकर वे उनके हित में कर्म करते — और इस अर्थ में उन पर निर्भर थे। शरीर-काल में जो अनुभव वे देते थे, वे महासमाधि के पश्चात भी अपने को उनसे जोड़ने वालों को मिलते रहते हैं।
शिष्य का कार्य: श्रद्धा और भक्ति के हृदय-दीप को साँचना; प्रेम की बत्तियाँ जलाना। प्रेम-रहित ज्ञान शुष्क है; ऐसा ज्ञान कोई नहीं चाहता।
श्री शेवड़े — आत्म-विश्वासी विद्यार्थी
अकलकोट (शोलापुर जिला) के श्री सपटनेकर विधि-परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। एक सहाध्यायी श्री शेवड़े सब में सबसे कम तैयार दिखाई दे रहे थे। विद्यार्थियों ने उपहास किया। शेवड़े ने उत्तर दिया:
"Though I am not prepared, I am sure to pass — my Sai Baba is there to get me through. There lives in a Masjid in Shirdi (Ahmednagar District) a fakir. He is a great Sat-purusha. Unless there is a great store of merits on one's account, one can't see Him. I fully believe in Him; what He says will never be untrue. He has assured me I will pass next year, and I am confident I will get through the final examination also with His grace."
(हिन्दी अर्थ: "यद्यपि मैं तैयार नहीं हूँ, मुझे उत्तीर्ण होने का पूर्ण विश्वास है — मेरे साईं बाबा मुझे पार करवा देंगे। शिरडी (अहमदनगर जिला) की एक मस्जिद में एक फ़कीर रहते हैं। वे एक महान सत्-पुरुष हैं। बहुत बड़े पुण्य-संचय के बिना कोई उनके दर्शन नहीं कर सकता। मेरा उन पर पूर्ण विश्वास है; जो वे कहते हैं वह कभी असत्य नहीं होगा। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया है कि मैं अगले वर्ष उत्तीर्ण हो जाऊँगा, और मुझे विश्वास है कि उनकी कृपा से अन्तिम परीक्षा भी पार करूँगा।")
सपटनेकर ने हँसी उड़ायी।
सपटनेकर — दस वर्ष बाद (1913)
सपटनेकर परीक्षा उत्तीर्ण हुए, अकलकोट में वकील रूप में बस गये। दस वर्ष बाद — 1913 में — गले की बीमारी से अपने एकमात्र पुत्र को खो बैठे। वे टूट गये।
वे पंढरपुर, गाणगापुर, और अन्य पुण्य-स्थलों पर तीर्थयात्रा को गये — कोई शान्ति नहीं। वेदान्त पढ़ा — सहायक नहीं। शेवड़े के आत्म-विश्वास का स्मरण आया, और शिरडी जाने का निर्णय किया।
प्रथम यात्रा — दो बार बाहर निकाले गये
वे अपने छोटे भाई पंडितराव के साथ गये। दूर से बाबा को देखना सुखद लगा। निकट आये, साष्टांग किया, एक नारियल रखा। बाबा ने तुरन्त चिल्लाया:
"Get away!"
(हिन्दी अर्थ: "हट जाओ!")
सपटनेकर पीछे हटे, अलग बैठ गये। सहायता के लिए बाला शिम्पी से सलाह ली। बाबा के चित्र ख़रीदकर पुनः आये। बाला ने बाबा से पूछा कि चित्र किसका है। बाबा (सपटनेकर की ओर इशारा करते हुए): "यह चित्र इसका यार (प्रेमी) है।" बाबा हँसे; सब हँसे।
बाला ने सपटनेकर को दर्शन का संकेत किया। ज्यों ही सपटनेकर साष्टांग होने लगे, बाबा फिर चिल्लाये:
"Get out!"
(हिन्दी अर्थ: "बाहर निकलो!")
उन्होंने जोड़े हाथों से प्रार्थना की। बाबा ने सपटनेकर को तुरन्त चले जाने का आदेश दिया। भाइयों ने उदास होकर शिरडी छोड़ दी।
श्रीमती सपटनेकर का स्वप्न
एक वर्ष बीता। सपटनेकर का मन अभी भी अशान्त था। वे गाणगापुर (और अधिक अशान्त), फिर माधेगाँव (विश्राम) गये, तदुपरान्त काशी जाने का निश्चय किया। प्रस्थान से दो दिन पूर्व पत्नी को दर्शन हुआ:
"She was going with a pitcher to Lakadsha's well. A fakir with a piece of cloth round his head, sitting at the foot of the neem tree, came close to her and said: 'My dear lassie, why get exhausted for nothing? I get your pitcher filled with pure water.' She was afraid of the fakir and hastened back with the empty pitcher. The fakir followed her. She awoke."
(हिन्दी अर्थ: "वे एक घड़ा लेकर लकड़शा के कुएँ जा रही थीं। नीम-वृक्ष के नीचे बैठा एक फ़कीर, सिर पर कपड़ा बाँधे, उनके पास आया और बोला: 'अरी पुत्री, व्यर्थ क्यों थकती हो? मैं तुम्हारा घड़ा शुद्ध जल से भरवा देता हूँ।' वे फ़कीर से डरीं और ख़ाली घड़ा लेकर शीघ्र पीछे लौटीं। फ़कीर पीछे-पीछे आया। वे जाग गयीं।")
उन्होंने पति को बताया। दोनों ने इसे शुभ-संकेत मानकर साथ शिरडी गये।
पहचान और पीड़ा-कथा
मस्जिद में बाबा लेन्डी पर थे। वे प्रतीक्षा में बैठे। जब बाबा लौटे, श्रीमती सपटनेकर ने स्वप्न-फ़कीर को स्वयं बाबा के रूप में पहचान लिया। उन्होंने विनम्रता से साष्टांग किया और बाबा को देखती बैठ गयीं।
बाबा अपनी विशिष्ट शैली में एक तृतीय-पक्ष को कथा सुनाने लगे:
"My arms, abdomen and waist are paining for a long time. I took many medicines, the pains did not abate. I got sick of the medicines as they gave me no relief. But I am surprised to see now that all the pains have disappeared at once."
(हिन्दी अर्थ: "मेरी बाँहें, उदर, और कमर लम्बे समय से दर्द कर रहे हैं। मैंने अनेक औषधियाँ लीं, पीड़ा कम नहीं हुई। औषधियों से ही ऊब गया — कोई आराम नहीं दे रहीं। परन्तु अब आश्चर्य हो रहा है कि सब पीड़ाएँ एकाएक लुप्त हो गयी हैं।")
कोई नाम नहीं लिया गया — परन्तु बाबा द्वारा वर्णित पीड़ाएँ श्रीमती सपटनेकर की थीं। वे तत्क्षण लुप्त हो गयीं।
सपटनेकर का प्रायश्चित्त — और बनिये की कथा
सपटनेकर पास आये। बाबा: "बाहर निकलो!" — फिर एक बार। सपटनेकर — और अधिक पश्चात्तापी — अपने पूर्व-उपहास के पापों को स्वीकार करने का निश्चय किया। उन्होंने बाबा को अकेला देखा, उनके चरणों पर सिर रखा। बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा; सपटनेकर बाबा का पैर मलते बैठ गये।
एक गड़रिन आयी और बाबा की कमर मलने लगी। बाबा ने उसे एक बनिये की कथा सुनाना आरम्भ किया — जीवन के उतार-चढ़ाव, जिसमें एक एकमात्र पुत्र की मृत्यु भी सम्मिलित थी। सपटनेकर समझ गये: यह उन्हीं की कथा है। बाबा सब विवरण जानते थे।
उसी विचार पर बाबा — गड़रिन को सम्बोधित करते और सपटनेकर की ओर इंगित करते — बोले:
"This fellow blames Me and charges Me with killing his son. Do I kill people's children? Why does this fellow come to the Masjid and cry? Now I will do this — I will again bring that very child back in his wife's womb."
(हिन्दी अर्थ: "यह व्यक्ति मुझ पर आरोप लगाता है कि मैंने उसके पुत्र को मार डाला। क्या मैं लोगों के बच्चे मारता हूँ? यह व्यक्ति मस्जिद में आकर क्यों रोता है? अब मैं यह करूँगा — मैं उसी बच्चे को उसकी पत्नी के गर्भ में पुनः लाऊँगा।")
उन्होंने आशीर्वाद-हाथ सपटनेकर के सिर पर रखा:
"These feet are old and holy; you are care-free now. Place entire faith in Me and you will soon get your object."
(हिन्दी अर्थ: "ये चरण वृद्ध और पावन हैं; अब तुम चिन्ता-रहित हो। मुझ पर पूर्ण-श्रद्धा रखो, और तुम्हें शीघ्र अपना लक्ष्य प्राप्त होगा।")
सपटनेकर ने अश्रुओं से बाबा के चरण धोये।
दैनिक पूजा और "प्रेम का एक नमस्कार"
सपटनेकर ने पूजा-नैवेद्य की तैयारी की, प्रति-दिन पत्नी के साथ मस्जिद आये, अर्पित किया, प्रसाद पाया। मस्जिद भरी हुई थी; सपटनेकर बार-बार बाबा को प्रणाम करते रहे। बाबा:
"Oh, why do you prostrate yourself now and then? The one Namaskar offered with love and humility is enough."
(हिन्दी अर्थ: "अरे, हर बार साष्टांग क्यों करते हो? प्रेम और विनम्रता से किया गया एक नमस्कार पर्याप्त है।")
उस रात्रि सपटनेकर ने चावड़ी की शोभा-यात्रा देखी। बाबा "साक्षात् पाण्डुरंग (विट्ठल) की भाँति" दिखे।
दो-रुपये दक्षिणा और नारियल
विदा पर सपटनेकर ने योजना बनायी: यदि बाबा दक्षिणा माँगें, पहले एक रुपया, और पुनः माँगें तो एक और — यात्रा-व्यय बचा रखना है। मस्जिद में एक रुपया अर्पित किया। बाबा ने एक और माँगा (मौन योजना के अनुरूप)। दिया गया। बाबा:
"Take the coconut, put it in your wife's oti (upper fold of her sari), and go away at ease without the least anxiety."
(हिन्दी अर्थ: "नारियल लो, अपनी पत्नी की ओटी (साड़ी का ऊपरी पल्लू) में रख दो, और तनिक भी चिन्ता बिना सुख से चले जाओ।")
मुरलीधर — और निभाया गया वचन
वर्ष के भीतर पुत्र जन्मा। पति-पत्नी 8-मासीय शिशु को बाबा के चरणों में लाये:
"हे साईंनाथ, हम नहीं जानते कि आपके उपकारों को कैसे चुकायें… आपके पवित्र चरण ही हमारी एकमात्र शरण हों।"
पुत्र का नाम मुरलीधर रखा गया। अन्य दो — भास्कर और दिनकर — आगे चलकर जन्मे। सपटनेकर समझ गये: बाबा के शब्द कभी असत्य नहीं होते।
इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन
- (सपटनेकर के प्रथम साष्टांग पर) "Get away!"
(हिन्दी अर्थ: "हट जाओ!")
- (चित्र उठाते हुए) "This photo is the Yara (Lover) of him."
(हिन्दी अर्थ: "यह चित्र इसका यार (प्रेमी) है।")
- (दूसरे प्रयास पर) "Get out!"
(हिन्दी अर्थ: "बाहर निकलो!")
- (तृतीय-पक्ष को — श्रीमती सपटनेकर की पीड़ाएँ अपनी रूप में) "My arms, abdomen and waist are paining for a long time… But I am surprised to see now that all the pains have disappeared at once."
(हिन्दी अर्थ: "मेरी बाँहें, उदर, और कमर लम्बे समय से दर्द कर रहे हैं… परन्तु अब आश्चर्य हो रहा है कि सब पीड़ाएँ एकाएक लुप्त हो गयी हैं।")
- (गड़रिन को, सपटनेकर की ओर इंगित करते हुए) "This fellow blames Me and charges Me with killing his son. Do I kill people's children?… Now I will do this — I will again bring that very child back in his wife's womb."
(हिन्दी अर्थ: "यह व्यक्ति मुझ पर आरोप लगाता है कि मैंने उसके पुत्र को मार डाला। क्या मैं लोगों के बच्चे मारता हूँ?… अब मैं यह करूँगा — मैं उसी बच्चे को उसकी पत्नी के गर्भ में पुनः लाऊँगा।")
- (सपटनेकर को आशीर्वाद) "These feet are old and holy; you are care-free now. Place entire faith in Me and you will soon get your object."
(हिन्दी अर्थ: "ये चरण वृद्ध और पावन हैं; अब तुम चिन्ता-रहित हो। मुझ पर पूर्ण-श्रद्धा रखो, और तुम्हें शीघ्र अपना लक्ष्य मिलेगा।")
- (बार-बार साष्टांग पर) "Oh, why do you prostrate yourself now and then? The one Namaskar offered with love and humility is enough."
(हिन्दी अर्थ: "अरे, हर बार साष्टांग क्यों करते हो? प्रेम और विनम्रता से किया गया एक नमस्कार पर्याप्त है।")
- (विदा पर नारियल देते हुए) "Take the coconut, put it in your wife's oti, and go away at ease without the least anxiety."
(हिन्दी अर्थ: "नारियल लो, अपनी पत्नी की ओटी में रख दो, और तनिक भी चिन्ता बिना सुख से चले जाओ।")
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।