अध्याय 47 — वीरभद्रप्पा और चेनबसप्पा: सर्प और मेंढक
स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html
मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai47.html
अनुभाग
प्रास्ताविक — संत नदी की आशा
हेमाडपंत: साईं का मुख-मण्डल धन्य है; एक दृष्टि पूर्व-जन्मों के दुःख नष्ट कर देती है; एक कृपा-दृष्टि कर्म-बन्धन छिन्न कर देती है। गंगा सब स्नायियों के पाप धोती है — परन्तु वह संतों के चरणों के स्पर्श की भी आकांक्षी है, क्योंकि उन्हीं का स्पर्श सब तीर्थयात्रियों के संचित पापों को हटा सकता है।
बाबा की चहल-क़दमी और टर्र-टर्र
बाबा का विवरण:
"One morning after taking My breakfast I strolled along till I came to a small river bank. As I was tired, I rested there, washed My hands and feet and had a bath and felt refreshed. There was a foot-path and a cart-track sheltered by shady trees. The breeze was also blowing gently. As I was preparing to smoke chillim, I heard the croaking of a frog."
(हिन्दी अर्थ: "एक प्रातः नाश्ते के पश्चात मैं टहलते-टहलते एक छोटी नदी के तट तक पहुँचा। थका हुआ था, वहाँ विश्राम किया, हाथ-पैर धोये, स्नान किया, और स्फूर्ति महसूस की। एक पैदल-पथ और गाड़ी-मार्ग था, छायादार वृक्षों से ढका। मन्द पवन भी चल रही थी। चिलम पीने की तैयारी कर रहा था कि एक मेंढक की टर्र-टर्र सुनी।")
एक राहगीर आये, बाबा के पास बैठे, प्रणाम किए, भोजन के लिए घर निमन्त्रित किया, चिलम जलाकर सौंपी। टर्र-टर्र चलती रही। बाबा:
"A frog is in trouble and is tasting the bitter fruit of its own karma. We have to reap now the fruit of what we sow in our past life, and there is no use crying about it."
(हिन्दी अर्थ: "एक मेंढक संकट में है, और अपने ही कर्म का कड़वा फल चख रहा है। पूर्व-जन्म में जो बोया, अब उसी का फल काटना है — रोना व्यर्थ है।")
राहगीर ने देखने की इच्छा प्रकट की। बाबा: "एक मेंढक को एक बड़े सर्प ने पकड़ा है; दोनों पूर्व-जन्म में दुष्ट थे।"
दृश्य और सम्बोधन
उन्होंने एक विशाल काले सर्प को मुख में एक बड़ा मेंढक थामे पाया। राहगीर ने अनुमान लगाया कि 10-12 मिनट में मेंढक खा लिया जायेगा। बाबा:
"No, this can't be. I am its father (protector) and I am here now. How shall I allow the snake to eat it up? Am I here for nothing? Just see how I release it."
(हिन्दी अर्थ: "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं उसका पिता (रक्षक) हूँ, और अब यहाँ हूँ। मैं सर्प को इसे खाने कैसे दे सकता हूँ? क्या मैं यहाँ निरर्थक हूँ? देखो, मैं इसे कैसे मुक्त करता हूँ।")
उन्होंने पुनः चिलम पी और निकट चले। राहगीर डर रहा था। बाबा ने प्राणियों को सम्बोधित किया:
"Oh Veerbhadrappa, has not your enemy Bassappa yet repented though he has been born as a frog, and you too, though born as a serpent, still maintain bitter enmity against him? Fie upon you, be ashamed; give up your hatred now and rest in peace."
(हिन्दी अर्थ: "अरे वीरभद्रप्पा, क्या तुम्हारा शत्रु बसप्पा अब भी पश्चात्ताप नहीं कर रहा, यद्यपि मेंढक के रूप में जन्मा है? और तुम भी, यद्यपि सर्प के रूप में जन्मे हो, अब भी उसके प्रति घोर शत्रुता बनाये हो? धिक्कार है, लज्जित हो; अब घृणा त्याग दो, और शान्ति से रहो।")
सर्प ने तत्क्षण मेंढक को छोड़ दिया, नदी में डुबकी लगायी, और अदृश्य हो गया। मेंढक झाड़ियों में कूद गया।
कर्म-शृंखला — पूर्व-जन्म 1
राहगीर ने पूछा कि वीरभद्रप्पा और बसप्पा कौन हैं। बाबा ने समझाया।
बाबा के स्थान से चार-पाँच मील दूर एक प्राचीन पुण्य-स्थल था — एक महादेव-मन्दिर। मन्दिर पुराना और जर्जर था। स्थानीयों ने कोष एकत्र किया; लेखे-जोखे और मरम्मत के पूर्ण प्रभार में एक धनी कंजूस को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया।
उसने बहुत कम व्यय किया। मन्दिर का काम अल्प चला। उसने अधिकांश राशि हड़प ली, अपना कुछ भी व्यय नहीं किया। निराश लोगों ने दूसरी बार चन्दा एकत्र किया। उसने पुनः कुछ नहीं किया।
महादेव उसकी पत्नी के स्वप्न में प्रकट हुए:
"You get up, build the dome of the temple; I will give you a hundred-fold of what you spend."
(हिन्दी अर्थ: "उठो, मन्दिर का गुम्बद बनाओ; जो भी व्यय करोगी, मैं उसका सौ-गुना दूँगा।")
उसने पति को बताया। उसने इसे एक बुरा स्वप्न बताकर हँसी कर दी जो दाम्पत्य-विवाद के लिए था, और उत्तर हड़प लिया। पत्नी को चुप रहना पड़ा।
महादेव पुनः प्रकट हुए:
"Do not bother yourself about your husband and the collections with him. Don't press him to spend any amount for the temple. What I want is feeling and devotion. So give, if you like, anything of your own."
(हिन्दी अर्थ: "अपने पति और उनके पास संग्रहित राशि की चिन्ता मत करो। उन्हें मन्दिर के लिए कोई व्यय करने को बाध्य मत करो। मुझे जो चाहिए वह है भाव और भक्ति। अतः यदि चाहो, तो अपना कुछ अर्पित करो।")
उसने अपने आभूषण — पिता से उपहार — अर्पित करने का निश्चय किया।
बंजर खेत
कंजूस ने आभूषणों का मूल्यांकन 1,000 रुपये पर कम कर अपने पास ख़रीद लिया। बदले में ईश्वर को एक खेत अनुदान-रूप में दिया। खेत उसका था ही नहीं — वह डुबाकी नामक एक निर्धन स्त्री का था जिसने 200 रुपयों में उसे बन्धक रखा था और छुड़ा नहीं सकी। ज़मीन बंजर थी, असिंचित, मूल्य-हीन। कंजूस ने इस प्रकार पत्नी, डुबाकी, और ईश्वर — तीनों को एक ही सौदे में ठगा।
निर्धन पुजारी ने अनुदान प्रसन्नता से स्वीकार किया।
तीन मौतें
एक भीषण तूफ़ान और मूसलाधार वर्षा आयी। कंजूस के घर पर बिजली गिरी। पति-पत्नी दोनों मर गये। डुबाकी ने भी प्राण त्याग दिए।
पूर्व-जन्म 2 — मथुरा
- धनी कंजूस मथुरा में एक ब्राह्मण परिवार में वीरभद्रप्पा के रूप में जन्मा।
- उसकी श्रद्धालु पत्नी उसी मन्दिर के पुजारी की पुत्री गौरी के रूप में जन्मी।
- डुबाकी मन्दिर के गुरव (सेवक) के परिवार में पुरुष-रूप चेनबसप्पा के रूप में जन्मी।
पुजारी बाबा के मित्र थे; उनकी पुत्री गौरी भी बाबा को समर्पित थी। पुजारी गौरी के लिए वर ढूँढ़ रहे थे। बाबा ने आश्वासन दिया कि वर स्वयं आ जायेगा।
उनकी जाति का एक निर्धन भटकता बालक — वीरभद्रप्पा — पुजारी के घर भिक्षा माँगने आया। बाबा की सम्मति से गौरी का विवाह उससे करा दिया गया। वीरभद्रप्पा प्रारम्भ में बाबा के प्रति समर्पित थे।
अचानक तेज़ी
भू-मूल्यों में अचानक उछाल आया। बंजर अनुदान-भूमि एक लाख रुपयों में बिकी — आभूषण-मूल्य का ठीक 100-गुना, महादेव के सौ-गुना वचन की पूर्ति। आधा नकद चुकाया गया; शेष 2,000 रुपये की 25 किस्तों में।
वीरभद्रप्पा ने धन माँगा। पक्षकार बाबा के पास आये। बाबा ने निर्णय दिया:
"The property belonged to God and was vested in the priest. Gouri is his sole heiress and proprietress. No amount should be spent without her consent. Her husband has no right whatsoever to the amount."
(हिन्दी अर्थ: "सम्पत्ति ईश्वर की थी और पुजारी में निहित थी। गौरी ही उनकी एकमात्र उत्तराधिकारिणी और स्वामिनी है। उनकी सम्मति के बिना कोई राशि व्यय नहीं होनी चाहिए। उसके पति का इस राशि पर कोई अधिकार नहीं है।")
वीरभद्रप्पा ने बाबा पर आरोप लगाया कि वे गौरी का दावा स्थापित कर सम्पत्ति हड़पना चाहते हैं। बाबा ने ईश्वर का स्मरण किया और मौन रहे।
गौरी का दर्शन और विभाजन
वीरभद्रप्पा ने गौरी को डाँटा। वे दोपहर बाबा के पास आयीं और रक्षा माँगी।
"I gave her a pledge that I would cross seven seas to help her."
(हिन्दी अर्थ: "मैंने उसे वचन दिया कि उसकी सहायता के लिए मैं सात समुद्र पार कर लूँगा।")
उस रात्रि महादेव गौरी के स्वप्न में आये:
"The whole money is yours; do not give anything to anybody. Spend some amount for temple purposes in consultation with Chenbassappa. If you want to use it for other purposes, consult Baba in the Masjid (Myself)."
(हिन्दी अर्थ: "सम्पूर्ण धन तुम्हारा है; किसी को कुछ मत दो। मन्दिर के लिए कुछ राशि चेनबसप्पा से परामर्श लेकर व्यय करना। यदि अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग करना हो, मस्जिद में बाबा (अर्थात् मुझसे) से परामर्श लेना।")
बाबा ने उन्हें परामर्श दिया:
"Take the principal or capital amount to yourself; give half the amount of interest to Chenbassappa; Veerbhadrappa has nothing to do in the matter."
(हिन्दी अर्थ: "मूलधन तुम स्वयं ले लो; ब्याज का आधा भाग चेनबसप्पा को दे दो; वीरभद्रप्पा का इस मामले से कोई सरोकार नहीं।")
दो धमकियाँ और दो वचन
जब बाबा बोल रहे थे, वीरभद्रप्पा और चेनबसप्पा — दोनों झगड़ते हुए आ गये। बाबा ने उन्हें शान्त करने का प्रयास किया और गौरी के दर्शन की बात बतायी। वीरभद्रप्पा क्रुद्ध हो उठे और चेनबसप्पा को टुकड़े-टुकड़े करके मार डालने की धमकी दी। चेनबसप्पा भीरु थे; उन्होंने बाबा के चरण पकड़े और शरण माँगी।
"I pledged Myself to save him from the wrath of his foe."
(हिन्दी अर्थ: "मैंने उसे अपने शत्रु के क्रोध से बचाने का वचन दिया।")
वीरभद्रप्पा मरकर सर्प बने; चेनबसप्पा मरकर मेंढक।
"Hearing the croaking of Chenbassappa and remembering My pledge, I came here, saved him, and kept My word. God runs to His devotees for help in times of danger. He saved Chenbassappa (the frog) by sending Me here. All this is God's Leela or sport."
(हिन्दी अर्थ: "चेनबसप्पा की टर्र-टर्र सुनकर और अपना वचन स्मरण कर मैं यहाँ आया, उसे बचाया, और अपना वचन निभाया। ईश्वर संकट के समय अपने भक्तों की सहायता के लिए दौड़ते हैं। उन्होंने मुझे यहाँ भेजकर चेनबसप्पा (मेंढक) को बचाया। यह सब ईश्वर की लीला है।")
तात्पर्य
हेमाडपंत की समापन-शिक्षा: जो बोया है, उसका फल काटना ही पड़ता है; जब तक कोई अपने पुराने ऋण भुगतकर नहीं चुका देता, कोई बचाव नहीं; धन के प्रति लोभ लोभी को निम्नतम स्तर तक खींच ले जाता है, और अन्ततः उसका तथा अन्यों का विनाश लाता है।
इस अध्याय में दर्ज वाणियाँ
- (राहगीर से, टर्र-टर्र पर) "A frog is in trouble and is tasting the bitter fruit of its own karma. We have to reap now the fruit of what we sow in our past life, and there is no use crying about it."
(हिन्दी अर्थ: "एक मेंढक संकट में है, और अपने कर्म का कड़वा फल चख रहा है। पूर्व-जन्म में जो बोया, अब उसी का फल काटना है — रोना व्यर्थ है।")
- (सर्प द्वारा मेंढक पकड़ने पर) "No, this can't be. I am its father (protector) and I am here now. How shall I allow the snake to eat it up? Am I here for nothing? Just see how I release it."
(हिन्दी अर्थ: "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं उसका पिता (रक्षक) हूँ, और अब यहाँ हूँ। मैं सर्प को इसे खाने कैसे दे सकता हूँ? क्या मैं यहाँ निरर्थक हूँ?")
- (सर्प को सम्बोधित करते हुए) "Oh Veerbhadrappa, has not your enemy Bassappa yet repented though he has been born as a frog, and you too, though born as a serpent, still maintain bitter enmity against him? Fie upon you, be ashamed; give up your hatred now and rest in peace."
(हिन्दी अर्थ: "अरे वीरभद्रप्पा, क्या तुम्हारा शत्रु बसप्पा अब भी पश्चात्ताप नहीं कर रहा, यद्यपि मेंढक के रूप में जन्मा है? और तुम भी, यद्यपि सर्प के रूप में जन्मे हो, अब भी उसके प्रति घोर शत्रुता बनाये हो? धिक्कार है — लज्जित हो; अब घृणा त्याग दो, और शान्ति से रहो।")
- (कंजूस की पत्नी को महादेव का प्रथम स्वप्न) "You get up, build the dome of the temple; I will give you a hundred-fold of what you spend."
(हिन्दी अर्थ: "उठो, मन्दिर का गुम्बद बनाओ; जो व्यय करोगी, मैं उसका सौ-गुना दूँगा।")
- (महादेव का द्वितीय स्वप्न) "Do not bother yourself about your husband and the collections with him. Don't press him to spend any amount for the temple. What I want is feeling and devotion. So give, if you like, anything of your own."
(हिन्दी अर्थ: "पति और उनके पास की राशि की चिन्ता मत करो। उन्हें व्यय करने को बाध्य मत करो। मुझे जो चाहिए वह भाव और भक्ति है। अतः अपना कुछ अर्पित करो।")
- (एक लाख पर बाबा का निर्णय) "The property belonged to God and was vested in the priest. Gouri is his sole heiress and proprietress. No amount should be spent without her consent. Her husband has no right whatsoever."
(हिन्दी अर्थ: "सम्पत्ति ईश्वर की थी और पुजारी में निहित थी। गौरी ही उनकी एकमात्र उत्तराधिकारिणी और स्वामिनी है। उनकी सम्मति के बिना कोई राशि व्यय नहीं होनी चाहिए। उसके पति का कोई अधिकार नहीं।")
- (गौरी को महादेव का स्वप्न) "The whole money is yours; do not give anything to anybody. Spend some amount for temple purposes in consultation with Chenbassappa. If you want to use it for other purposes, consult Baba in the Masjid."
(हिन्दी अर्थ: "सम्पूर्ण धन तुम्हारा है; किसी को कुछ मत दो। मन्दिर के लिए कुछ राशि चेनबसप्पा से परामर्श लेकर व्यय करना। यदि अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग करना हो, मस्जिद में बाबा से परामर्श लेना।")
- (गौरी को वचन) "I would cross seven seas to help her."
(हिन्दी अर्थ: "उसकी सहायता के लिए मैं सात समुद्र पार कर लूँगा।")
- (समापन) "Hearing the croaking of Chenbassappa and remembering My pledge, I came here, saved him, and kept My word. God runs to His devotees for help in times of danger."
(हिन्दी अर्थ: "चेनबसप्पा की टर्र-टर्र सुनकर और अपना वचन स्मरण कर मैं यहाँ आया, उसे बचाया, और अपना वचन निभाया। ईश्वर संकट के समय अपने भक्तों की सहायता के लिए दौड़ते हैं।")
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।