अध्याय 41 — चित्र की कथा; चिथड़ों की चोरी; बी. वी. देव और ज्ञानेश्वरी
स्रोत: श्री साईं सच्चरित्र, अनुवादक: न. वि. गुणाजी
मराठी मूल: सच्चरित (archive.org स्कैन) · भक्त-बयान: नरसिंह स्वामी 1936 (Internet Archive) · पूर्ण ग्रन्थ-सूची: /hi/sources.html
मूल पाठ: https://www.saibaba.org/satcharitra/sai41.html
अनुभाग
अली महोमेद का चित्र — बचाव
अध्याय 40 की घटना के नौ वर्ष पश्चात अली महोमेद हेमाडपंत से मिले और चित्र उन तक कैसे आया — यह कथा सुनायी।
अली महोमेद ने एक बम्बई के फेरीवाले से बाबा का एक चित्र ख़रीदा था, फ्रेम कराकर अपने बान्द्रा-स्थित घर में टाँगा था। वे बाबा से प्रेम करते थे और नित्य उसका दर्शन करते थे।
हेमाडपंत को चित्र देने से तीन मास पूर्व उन्हें पैर में एक फोड़ा हुआ था; शल्य-क्रिया हुई थी; वे अपने बहनोई नूर-मोहमद पीरभाई के बम्बई-निवास पर स्वास्थ्य-लाभ कर रहे थे। तीन मास तक उनका बान्द्रा-घर बन्द रहा। वहाँ केवल चित्र टँगे थे — बाबा अब्दुल रहमान के, मौलानासाहेब मोहमद हुसैन के, साईं बाबा के, बाबा ताजुद्दीन के, और अन्य जीवित संतों के।
चित्रों का डुबाया जाना
कई वर्ष पहले अली महोमेद ने बाबा अब्दुल रहमान का एक छोटा चित्र मोहमद हुसैन थरियाटोपन से प्राप्त किया और नूर-मोहमद पीरभाई को दे दिया था। आठ वर्ष तक मेज़ पर रखने के पश्चात नूर-मोहमद ने एक फ़ोटोग्राफ़र से उसका विशाल आकार में आवर्धन कराया और सम्बन्धियों-मित्रों — अली महोमेद सहित — को प्रतियाँ वितरित कीं।
नूर-मोहमद संत अब्दुल रहमान के शिष्य थे। जब उन्होंने आवर्धित चित्र खुले दरबार में अपने गुरु को भेंट करना चाहा, गुरु — मूर्ति-पूजा के विरोधी — क्रुद्ध हो उठे, मारने को दौड़े, और उन्हें बाहर निकाल दिया। नूर-मोहमद व्याकुल थे: धन भी गया, और गुरु भी नाराज़।
उन्होंने आवर्धित चित्र अपोलो बन्दर ले जाकर एक नाव किराये पर ली और समुद्र में डुबा दिया। मित्रों-सम्बन्धियों से बाँटी छह प्रतियाँ वापस लीं और एक मछुवारे से बान्द्रा के समुद्र में फिंकवायीं।
उस समय अली महोमेद अपने बहनोई के घर थे। नूर-मोहमद ने उनसे कहा कि उनका कष्ट भी समाप्त हो जायेगा यदि वे अपने बान्द्रा-घर के संत-चित्र भी डुबा दें। अली महोमेद ने अपने मेहता (प्रबन्धक) को लाने भेजा। मेहता सब चित्रों के साथ लौटा — परन्तु साईं बाबा का चित्र नहीं।
जब दो मास पश्चात अली महोमेद घर लौटे, उन्होंने बाबा के चित्र को दीवार पर पूर्ववत् पाया। वे समझ नहीं सके। उन्होंने तुरन्त उसे एक अलमारी में सुरक्षित रख दिया, इस भय से कि बहनोई कहीं नष्ट न कर दें।
चित्र हेमाडपंत के पास
इसे कैसे रखें — यह विचार करते हुए, "साईं बाबा ने ही, मानो, सुझाव दिया कि वे मौलाना इस्मू मुजावर से भेंट और परामर्श करें।" मौलाना और अली महोमेद ने मिलकर निर्णय किया कि चित्र अन्नासाहेब (हेमाडपंत) को सुरक्षा के लिए भेंट किया जाये।
वे हेमाडपंत के पास गये और "ठीक समय पर" चित्र भेंट कर दिया। हेमाडपंत की व्याख्या: यह दर्शाता है कि बाबा भूत-वर्तमान-भविष्य को जानते थे, और कुशलता से सूत्र खींचकर भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करते थे।
बी. वी. देव और ज्ञानेश्वरी — दीर्घ प्रतीक्षा
दहाणू (ठाणे जिला) के मामलतदार बी. वी. देव दीर्घकाल से ज्ञानेश्वरी (गीता पर ज्ञानेश्वर का मराठी भाष्य) पढ़ना चाहते थे। प्रति-दिन एक गीता-अध्याय और अन्य ग्रन्थों के अंश सहज पढ़ लेते; परन्तु ज्ञानेश्वरी का प्रत्येक प्रयास बाहरी विचारों से अवरुद्ध हो जाता।
उन्होंने तीन मास का अवकाश लिया, शिरडी गये, फिर अपने पौंड घर विश्राम के लिए। पौंड में भी ज्ञानेश्वरी अपठनीय रही; अन्य ग्रन्थ ठीक चलते। उन्होंने संकल्प किया: जब तक बाबा आदेश न दें, वे आरम्भ नहीं करेंगे।
शिरडी में — चार दक्षिणाएँ
फरवरी 1914 में देव परिवार सहित शिरडी गये। बापूसाहेब जोग ने पूछा कि क्या वे ज्ञानेश्वरी पढ़ रहे हैं। देव ने उत्तर दिया: वे बाबा के आदेश की प्रतीक्षा में हैं। जोग ने परामर्श दिया कि एक प्रति बाबा को अभिमन्त्रण के लिए ले जायें। देव ने मना किया: "बाबा मेरा हृदय जानते हैं। क्या वे स्पष्ट आदेश देकर मेरी इच्छा पूर्ण नहीं करेंगे?"
देव ने 1 रुपया दक्षिणा दी। बाबा ने 20 रुपये माँगे — देव ने दिए।
उस रात्रि देव एक बालकराम से मिले और पूछा कि उन्होंने बाबा की कृपा कैसे प्राप्त की। बालकराम ने अगले दिन आरती के पश्चात बताने का वचन दिया।
अगले प्रातः दर्शन पर बाबा ने पुनः 20 रुपये माँगे — देव ने प्रसन्नता से दिए। मस्जिद भरी हुई थी; देव अलग बैठ गये; बाबा ने उन्हें निकट आकर शान्ति से बैठने को कहा।
मध्याह्न-आरती के पश्चात देव वचन-भरे विवरण के लिए पुनः बालकराम के पास गये। बालकराम बोलने ही वाले थे — कि बाबा ने एक कुष्ठ-रोगी भक्त चन्द्रू को देव को बुलाने भेजा। बाबा ने पूछा: "कब, किसके साथ, और क्या बात कर रहे थे?" देव ने कहा: बालकराम के साथ, बाबा के यश के विषय में।
बाबा ने 25 रुपये माँगे — देव ने दिए।
"तुमने मेरे चिथड़े चुराये"
बाबा तब देव को भीतर ले गये, खम्भे के पास बैठाया, और आरोप लगाया:
"You stole away My rags without My knowledge."
(हिन्दी अर्थ: "तुमने मेरी जानकारी के बिना मेरे चिथड़े चुराये।")
देव ने किसी जानकारी से इनकार किया। बाबा ने खोजने को कहा। उन्होंने खोजा; कुछ नहीं मिला।
बाबा क्रुद्ध हुए:
"There is nobody here, you are the only thief, so grey-haired and old, you came here for stealing."
(हिन्दी अर्थ: "यहाँ और कोई नहीं है — तुम ही एकमात्र चोर हो, इतनी पकी दाढ़ी, इतना वृद्ध, और चोरी के लिए यहाँ आये।")
एक घंटे तक बाबा डाँटते-फटकारते रहे। देव मौन बैठे रहे, देखते, आधे अपेक्षा में थे कि कहीं पीटा भी न जाये। अन्ततः बाबा ने उन्हें वाडे भेज दिया।
व्याख्या
दोपहर बाद बाबा ने देव सहित सब को बुलाया। उन्होंने कहा कि शायद उनके शब्दों ने वृद्ध को कष्ट दिया हो, परन्तु चोरी वास्तविक थी — अतः उन्हें बोलना ही था। 12 रुपये और माँगे। देव ने दिए और साष्टांग किए।
बाबा तब बोले:
"What are you doing?" — "Nothing." — "Go on daily reading the Pothi (Jnaneshwari), go and sit in the Wada, read something regularly every day and while reading, explain the portion read, to all with love and devotion. I am sitting here ready to give you the whole gold-embroidered Shela, then why go to others to steal rags, and why should you get into the habit of stealing?"
(हिन्दी अर्थ: "क्या कर रहे हो?" — "कुछ नहीं।" — "प्रति-दिन पोथी (ज्ञानेश्वरी) पढ़ते रहो, वाडे में जाकर बैठो, प्रति-दिन कुछ नियमित पढ़ो — और पढ़ते समय उस अंश को सब को प्रेम-भक्ति से व्याख्यायित करो। मैं यहाँ बैठा हूँ — तुम्हें पूरी स्वर्ण-कशीदाकारी का शेला देने को तत्पर — फिर अन्यों के पास चिथड़े चुराने क्यों जाते हो, और चोरी की आदत क्यों डालते हो?")
देव समझ गये: बालकराम से बाबा की कृपा के विषय में पूछना ही "चिथड़े चुराना" था। बाबा स्रोत थे; अन्य शिष्यों से पूछना चोरी थी। देव ने फटकार को पुष्प और आशीर्वाद रूप में स्वीकार किया।
स्वप्न-दर्शन (2 अप्रैल 1914)
बात आदेश तक सीमित नहीं रही। एक वर्ष में, 2 अप्रैल 1914, गुरुवार प्रातः, बाबा देव को स्वप्न-दर्शन में आये। ऊपरी मंज़िल पर बैठकर पूछा:
"Do you understand the Pothi?" देव: "नहीं।" बाबा: "तो कब समझोगे?"
देव रो पड़े:
"Unless You shower Your grace, the reading is mere worry and the understanding is still more difficult."
(हिन्दी अर्थ: "जब तक आप कृपा-वर्षा न करें, पाठ केवल चिन्ता है, और समझ और भी कठिन।")
बाबा:
"While reading you make haste, read it before Me, in My presence." देव: "क्या पढ़ूँ?" बाबा: "अध्यात्म (आध्यात्मिक तत्त्व) पढ़ो।"
देव ग्रन्थ लाने जा रहे थे — कि जाग गये। हेमाडपंत: "पाठक स्वयं कल्पना करें कि इस दर्शन के पश्चात देव को कितना अनिर्वचनीय हर्ष और आनन्द हुआ होगा।"
इस अध्याय में दर्ज साईं बाबा के शब्दशः वचन
- (देव को खम्भे पर आरोप) "You stole away My rags without My knowledge."
(हिन्दी अर्थ: "तुमने मेरी जानकारी के बिना मेरे चिथड़े चुराये।")
- (फटकार-दृश्य में) "There is nobody here, you are the only thief, so grey-haired and old, you came here for stealing."
(हिन्दी अर्थ: "यहाँ और कोई नहीं है — तुम ही एकमात्र चोर हो, इतनी पकी दाढ़ी, इतना वृद्ध, और चोरी के लिए यहाँ आये।")
- (पढ़ने का आदेश) "Go on daily reading the Pothi (Jnaneshwari), go and sit in the Wada, read something regularly every day and while reading, explain the portion read, to all with love and devotion. I am sitting here ready to give you the whole gold-embroidered Shela, then why go to others to steal rags, and why should you get into the habit of stealing?"
(हिन्दी अर्थ: "प्रति-दिन पोथी (ज्ञानेश्वरी) पढ़ते रहो, वाडे में जाकर बैठो, प्रति-दिन कुछ नियमित पढ़ो — और पढ़ते समय उस अंश को सब को प्रेम-भक्ति से व्याख्यायित करो। मैं यहाँ बैठा हूँ — पूरी स्वर्ण-कशीदाकारी का शेला देने को तत्पर — फिर अन्यों के पास चिथड़े चुराने क्यों जाते हो, और चोरी की आदत क्यों डालते हो?")
- (स्वप्न-दर्शन, 2 अप्रैल 1914) "Do you understand the Pothi? Then when are you going to understand?… While reading you make haste, read it before Me, in My presence. Read Adhyatma (spiritualism)."
(हिन्दी अर्थ: "क्या तुम पोथी समझते हो? तो कब समझोगे?… पढ़ते समय जल्दी मत करो — मेरे सम्मुख, मेरी उपस्थिति में पढ़ो। अध्यात्म पढ़ो।")
मूल अध्याय: saibaba.org · अंग्रेज़ी संस्करण: English version
यह पृष्ठ हेमाडपंत की मूल कथा का स्रोत-सम्मत हिन्दी रूपान्तरण है — कोई कथन बाबा के शब्दों के रूप में नहीं जोड़ा गया है। हर बाबा-वचन के साथ मूल अंग्रेज़ी पाठ भी संलग्न है।