मेघा (दिवंगत 1912)
विरमगाँव का सरल, अनपढ़ ब्राह्मण रसोइया, राव बहादुर ह. वि. साठे की नौकरी में। प्रारम्भ में 'मुसलमान बाबा' को प्रणाम करने से इनकार — आगे चलकर बारह वर्ष प्रति-दिन बेल-पत्र से बाबा की शिव-पूजा करते रहे। 1912 में देहान्त; बाबा ने स्वयं शव-यात्रा में चलकर पुष्प-वर्षा की।
मूल तथ्य
| जन्म-स्थान | विरमगाँव |
|---|---|
| स्वामी | राव बहादुर ह. वि. साठे |
| मन्त्र | 'नमः शिवाय' (पंचाक्षर); गायत्री और संध्या साठे ने सिखायी |
| देहान्त | 1912 — दैनिक आरती के अनेक वर्षों के पश्चात |
| बाबा के अन्तिम शब्द | शव पर हाथ फेरते — 'यह मेरा सच्चा भक्त था' (अध्याय 31) |
जीवन-प्रसंग
'मुसलमान को प्रणाम कैसे'
ब्रॉच रेलवे स्टेशन पर मेघा को ज्ञात हुआ कि बाबा मुसलमान हैं। निष्ठावान ब्राह्मण-चित्त उद्विग्न हो उठा। साठे को वापस बुलाने की प्रार्थना की। साठे ने आग्रह किया। मस्जिद में बाबा ने मेघा के मन को पढ़ा: 'तुम उच्च-जाति ब्राह्मण हो और मैं निम्न-मुसलमान — यहाँ आने से तुम अपनी जाति खो दोगे। चले जाओ।' मेघा काँप उठे (अध्याय 28)।
बेल-पत्र-पूजा
दूसरी बार लौटने पर मेघा बाबा को शिव-साक्षात्-रूप मानने लगे। प्रति-दिन कोसों दूर से बेल-पत्र लाते, पहले प्रत्येक ग्राम-देवता की पूजा करते, फिर मस्जिद आकर बाबा की गद्दी को प्रणाम, बाबा की पूजा, पैर दबाना, और चरण-तीर्थ पीना (अध्याय 28)।
गोमती-स्नान का चमत्कार
मकर-संक्रान्ति पर मेघा आठ कोस चलकर गोमती-जल लाये। बाबा ने सिर पर एक धार के लिए सम्मति दी। प्रेम से अभिभूत मेघा ने 'हर गंगे!' चिल्लाकर पूरा पात्र बाबा के शरीर पर उँडेल दिया। देखा — बाबा का सिर भीगा, परन्तु शरीर पूर्णतः सूखा था (अध्याय 28)।
त्रिशूल और पिण्डी
बारह मास के पूजन के बाद बाबा प्रात:पूर्व मेघा को दर्शन में आये: 'मेघा, एक त्रिशूल बनाओ।' अगले दिन एक रामदासी ने एक पिण्डी (शिव-मूर्ति) अर्पित की। बाबा बोले: 'देखो, शंकर आये हैं — अब इनकी पूजा करो' (अध्याय 28)।
देहान्त, 1912
मेघा की मृत्यु पर बाबा ने स्वयं शव-यात्रा का अनुगमन किया, पुष्प-वर्षा की, साधारण मनुष्य की भाँति रोये, और हाथ फेरकर कहा: 'यह मेरा सच्चा भक्त था।' बाबा के आदेश पर श्राद्ध-भोज का व्यय बाबा-कोष से ही किया गया, काकासाहेब दीक्षित के माध्यम से (अध्याय 31)।