बाबा की केन्द्रीय शिक्षाएँ
सच्चरित्र में बार-बार आये बाबा के मूल वचन — विषयानुसार संगठित। हर शिक्षा का अध्याय-संदर्भ साथ है।
श्रद्धा और सबूरी
"मेरे गुरु ने मुझसे केवल दो पैसे माँगे — श्रद्धा (निष्ठा) और सबूरी (धैर्य)।"
— अध्याय 18-19, राधाबाई-प्रसंग
सच्चरित्र की केन्द्रीय शिक्षा — बाबा के अनुसार उनके अपने गुरु ने उन्हें यही दिया था।
हिन्दू-मुसलमान एकता
"राम और रहीम एक ही हैं… उनके भक्त परस्पर क्यों झगड़ें? दोनों समुदायों को हाथ मिलाकर एक साथ लाओ।"
— अध्याय 10
बाबा ने जीवन-भर मस्जिद में हिन्दू पूजा और मुसलमान नमाज़ — दोनों चलने दीं। रामनवमी और मोहर्रम साथ-साथ मनाये गये (अध्याय 6)।
अहिंसा — सब प्राणियों में ईश्वर
"वह कुत्ता जिसे तुमने रोटी दी, वह मेरा ही रूप है… जो इन सब प्राणियों में मुझे देखता है, वही मेरा प्रिय भक्त है।"
— अध्याय 9, श्रीमती तारखड से
"ईश्वर सब प्राणियों में निवास करते हैं — सर्प हों या बिच्छू… उनकी इच्छा के बिना कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
— अध्याय 22
नवविधा भक्ति
अध्याय 21 — अनन्तराव पटनकर के "नौ गोले लीद" दृष्टान्त के माध्यम से दादा केलकर द्वारा व्याख्यायित:
- श्रवण — सुनना
- कीर्तन — गाना
- स्मरण — स्मरण
- पाद-सेवन — चरण-शरण
- अर्चन — पूजा
- नमस्कार — प्रणाम
- दास्य — सेवा
- सख्यत्व — सख्य
- आत्म-निवेदन — आत्म-समर्पण
सरलतम साधना — नाम-स्मरण
"यदि तुम सदा 'साईं, साईं' कहोगे, मैं तुम्हें सात समुद्र पार करा दूँगा। मुझे पूजा के साज-सामान की आवश्यकता नहीं।"
— अध्याय 13
"अपनी सब चतुराई त्याग दो, और सदा 'साईं, साईं' स्मरण करो।"
— अध्याय 10
दक्षिणा का सिद्धान्त
"मैं किसी से कुछ नहीं लेता। मस्जिदमाई ऋण की पुकार लगाती है — दानदाता उसे चुकाकर मुक्त हो जाता है… दक्षिणा वैराग्य को बढ़ाती है, और इस प्रकार भक्ति और ज्ञान को। एक दो, दस पाओ।"
— अध्याय 14, 35, 36
निरन्तर उपस्थिति — महासमाधि के पश्चात
"विश्वास करो — यद्यपि मैं देह त्याग दूँगा, मेरी समाधि की हड्डियाँ तुम्हें आशा और आत्म-विश्वास देंगी… जब-जब और जहाँ-जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।"
— अध्याय 25, दामू अन्ना को
संत और ईश्वर एक हैं
"तुम्हारे नाम-रूप के अतिरिक्त तुममें — और सब प्राणियों में — एक 'होने' का बोध, एक अस्तित्व-चेतना है। **वही मैं हूँ।**"
— अध्याय 43-44
गुरु की अनिवार्यता
"मार्ग कठिन है। बीच जंगल में बाघ और भेड़िये हैं। पथ-प्रदर्शक के साथ कोई कठिनाई नहीं। बिना पथ-प्रदर्शक के, जंगल में भटक जाने का खतरा है।"
— अध्याय 2, काकासाहेब दीक्षित को
उपवास का निषेध
"उपवास की क्या आवश्यकता है? न उपवास उत्तम है, न अति-भोजन। आहार में संयम ही शरीर और मन — दोनों के लिए हितकर है।"
— अध्याय 32, श्रीमती गोखले को