शिरडी के प्रमुख स्थल
शिरडी अहमदनगर जिले की कोपरगाँव तहसील में स्थित है — रहाता और निमगाँव के मध्य। बाबा ने जीवन-काल में कभी इन दो स्थानों की सीमा पार नहीं की (अध्याय 8)।
द्वारकामाई (मस्जिद)
वह पुरानी छोटी मस्जिद जिसमें बाबा ने 60 वर्ष निवास किया। बाबा ने इसे 'द्वारका' (कृष्ण की नगरी) + 'माई' (माता) से 'द्वारकामाई' नाम दिया। यहाँ वह पुरानी ईंट थी जिस पर बाबा हाथ रखकर सोते थे — और जो अध्याय 43 में टूट गयी थी।
चावड़ी
मस्जिद के निकट का छोटा दो-कमरों का भवन। बाबा यहाँ एकान्तर रातों में सोते थे। चावड़ी शोभा-यात्रा (अध्याय 37) 10 दिसम्बर 1909 से 15 अक्टूबर 1918 तक चली।
तीन वाडे
- साठेवाडा — नीम वृक्ष वाला स्थान, हरि विनायक साठे द्वारा निर्मित। यहीं बाबा की प्रथम तपस्या (अध्याय 4)।
- दीक्षित वाडा — काकासाहेब दीक्षित द्वारा 10 दिसम्बर 1910 को नींव; रामनवमी 1911 पर निवास-योग्य।
- बूटी वाडा / समाधि मन्दिर — बापूसाहेब बूटी द्वारा निर्मित; मुरलीधर-मूर्ति के लिए केन्द्रीय गर्भ; अन्ततः वहीं बाबा की समाधि (16 अक्टूबर 1918)।
लेन्डी बाग़
मस्जिद से कुछ दूर एक उद्यान जहाँ बाबा प्रति-दिन प्रातः जाते थे। यहाँ एक नीम-वृक्ष और एक छोटा कुआँ है। अनेक प्रसंगों में लेन्डी का उल्लेख आता है।
नीम वृक्ष (बाबा के गुरु की समाधि-स्थली)
साठेवाडे के निकट वह नीम वृक्ष जिसके नीचे बाबा सोलह वर्ष की आयु में तपस्या करते दिखे थे। नीचे का तहख़ाना — खण्डोबा द्वारा एक भक्त में प्रवेश करके खुलवाया — को म्हाळसापति और प्रारम्भिक भक्त बाबा के अनाम गुरु की समाधि-स्थली मानते थे।
खण्डोबा-मन्दिर और वट-वृक्ष
वह स्थान जहाँ चाँद पाटिल की बारात के साथ बाबा द्वितीय बार शिरडी आये थे — म्हाळसापति ने वहीं 'या साईं' से उनका स्वागत किया (अध्याय 5)।
शिरडी का भूगोल
अहमदनगर जिला, कोपरगाँव तहसील। कोपरगाँव में गोदावरी पार करने के पश्चात तीन कोस (9 मील) पर निमगाँव; वहाँ से शिरडी दिखाई देती है (अध्याय 4)।